गौरव पाण्‍डेय, चम्‍पावत :
उत्तराखंड के लोगों का मां नंदा सुनंदा से जीवंत रिश्ता है। मां नंदा उत्तराखंड में आराध्य देवी के रूप में पूजी जाती हैं। यहां के पहाड़, पर्वत श्रृंखला, नदियां और नगर तक नंदा देवी के नाम से जाने जाते हैं। भाद्रपक्ष की अष्टमी को मनाए जाने वाला नंदाष्टमी पर्व पूरे उत्तराखंड को एक सूत्र में पिरोता है। वर्ष 1673 में चंद राजा गढ़वाल के जूनागढ़ किले को जीतने के बाद रण देवी के रुप में नंदा की प्रतिमा को अपने साथ ले आए। जिसका एक भाग बैजनाथ और दूसरा भाग अल्मोड़ा में स्थापित किया गया है। यूं तो पूरे उत्तराखंड में यह पर्व अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है, लेकिन चम्पावत में देव डंगरियों की भूमिका मुख्य होने से यह अपनी तरह का अलग आयोजन बनता जा रहा है।

चम्‍पावत में देव डंगरियों की भूमिका बेहद अहम है। पांच साल पुरानी तस्‍वीर में डंगरियों को स्‍नान कराते समिति के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष स्‍व. त्रिभुवन गिरी। फाइल फोटो 

कुमाऊं की उत्पत्ति एवं चंद शासकों के अतीत स्वर्णकाल का मूक दर्शक रहे चम्पावत को चंद राजाओं ने 1563 तक अपनी राजधानी बनाए रखा। इसके बाद राजधानी अल्मोड़ा स्थानांतरित हो गई। अपने साम्राज्य का विस्तार करते हुए 1673 में राजा बाज बहादुर चंद ने गढ़वाल के जूना गढ़ किले को फतह कर लिया और वह अपने साथ मां नंदा देवी की प्रतिमा ले आए। अल्मोड़ा पहुंचने से पूर्व राजा और सैनिकों ने नंदा देवी के डोले के साथ गरुड़ में विश्राम किया। दूसरे दिन जब राजा राजगुरु के साथ डोले में रखी प्रतिमा की पूजा करने आए तो मूर्ति दो भागों में खंडित हो चुकी थी। विचार विमर्श के बाद मूर्ति के एक भाग को वहीं स्थापित कर कोटमाई के नाम से प्रतिष्ठा की गई और दूसरे को अल्मोड़ा के राजमहल में अपनी कुलदेवी गौरा के साथ स्थापित किया गया। वर्ष 1857 तक इसका पूजन चम्पावत वंश के चंद राजाओं द्वारा किया जाता रहा। लेकिन अंतिम राजा आनंद सिंह की अविवाहित अवस्था में मौत हो जाने के कारण काशीपुर के चंद वंशजों द्वारा पूजन की परंपरा को आगे बढ़ाया गया। जो आज भी जारी है।

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गढ़वाल में नंदा राजजात यात्रा तथा कुमाऊं मां नंदा-सुनंदा के आयोजन उत्तराखंड को एकसूत्र में पिरोते हैं। चम्पावत में 1563 तक चंद राजा अपनी कुलदेवी गौरा की पूजा अर्चना करते आए थे। परंतु राजधानी अल्मोड़ा जाने के बाद इसमें ठहराव आ गया। वर्ष 2007 में ठीक 444 साल बाद चम्पावत में आयोजन की शुरुआत हुई। कुमाऊं के अन्य हिस्सों में होने वाले आयोजन से यहां थोड़ी भिन्नता है। पूजा सहित तमाम विधिविधान एक से हैं, लेकिन यहां देव डंगरियों की मुख्य भूमिका है। नंदा सुनंदा के डोल यात्रा के साथ ही कदली वृक्ष आमंत्रण व आगमन के मौके पर देव डंगरिए अवतरित होकर आर्शीवाद देते हैं। जिससे चम्पावत की एतिहासिकता के साक्षात दर्शन देखने को मिल रहे हैं। बहरहाल मां नंदा कुमाऊं और गढ़वाल को सदियों से एक सूत्र में पिरोने का काम कर रही है।

       फाइल फोटो।

444 साल बाद हुई आयोजन की शुरुआत
चम्पावत में 1563 तक चंद अपनी कुलदेवी गौरा की पूजा अर्चना करते आए थे। परंतु राजधानी अल्मोड़ा जाने के बाद इसमें ठहराव आ गया। वर्ष 2007 में ठीक 444 साल बाद यहां आयोजन की शुरुआत हुई। कुमाऊं के अन्य हिस्सों में होने वाले आयोजन से यहां थोड़ी भिन्नता है। पूजा सहित तमाम विधि-विधान एक से हैं।

चम्पावत में देव डंगरियों की भूमिका अहम
यहां आयोजित होने वाले महोत्सव में देव डंगरियों की मुख्य भूमिका है। नंदा सुनंदा के डोल यात्रा के साथ ही कदली वृक्ष आमंत्रण व आगमन के मौके पर देव डंगरिए अवतरित होकर आर्शीवाद देते हैं। जिससे चम्पावत की ऐतिहासिकता के साक्षात दर्शन देखने को मिल रहे हैं और मां नंदा कुमाऊं और गढ़वाल को सदियों से एक सूत्र में पिरोने का काम कर रही है।

इस बार नहीं निकलेगी झांकी, मंदिर परिसर में ही होगी डोले की परिक्रमा
चम्पावत : कोरोना की वजह से इस बार मां नंदा-सुनंदा महोत्सव भी प्रभावित रहेगा। बालेश्वर मंदिर में समिति के अध्यक्ष शंकर पांडेय की अध्यक्षता में बैठक हुई। जिसमें निर्णय लिया गया कि कोरोना की वजह से कार्यक्रम बेहद सूक्ष्म रूप में आयोजित होंगे। पूजा-अनुष्ठान और हवन होगा, लेकिन पिछले वर्षों की अपेक्षा इस बार यजमानों की संख्या कम होगी। सांस्कृतिक कार्यक्रम, बच्चों की झांकी व प्रतियोगिताएं आयोजित नहीं होंगी। डोले की परिक्रमा मंदिर परिसर में ही किए जाने का निर्णय लिया गया। बैठक में पालिकाध्यक्ष विजय वर्मा, विकास साह, प्रकाश पांडेय, अमित वर्मा, विमल साह, पवन गिरी, रवि पटवा, कमल पटवा, रितेश राय, सन्नी पटवा, उमेश राय मुन्ना, अंकित पांडेय, युवराज साह मौजूद रहे।

—- मां नंदा-सुनंदा महोत्‍सव की पिछले कुछ वर्षों की तस्‍वीरें —-

फाइल फोटो।
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मां नंदा सुनंदा।
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