satu athu parv

विश्वव्यापी आपदा कोराना ने लोक सांस्कृतिक उत्सवों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। कुमाऊं का प्रमुख लोकोत्सव सातूं-आठू भी इससे बच नहीं पाया है। हालाकि पारंपरिक रुप से यहां के उत्सवप्रेमियों ने इस बार इस पर्व को मनाने की परंपरा को छोड़ा नहीं लेकिन वह उत्साह इस बार देखने को नहीं मिला, जो अब तक दिखाई पड़ता था। केवल कुमाऊं ही नहीं, सीमावर्र्ती नेपाल में भी यह त्यौहार इस बार फीका दिखाई पड़ा।
उल्लेखनीय है कि कुमाऊं और सीमावर्ती नेपाल में सातूं-आठूं का त्यौहार हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाता है। भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत एवं समानताएं दोनों राष्ट्रों में एक जैसी ही हैं। नेपाल और भारत के अनेक त्यौहारों, उत्सवों एवं काज-बार में सबसे प्रमुख भारत के उत्तराखंड में, विशेष रूप से कुमाऊं क्षेत्र और पश्चिमी नेपाल के मानस प्रदेश या डोटी प्रदेश में सदियों से मनाया जाने वाला सर्वाधिक लोकप्रिय और सात्विक उत्सव गौरा/गमरा उत्सव है। यह वर्तमान नेपाल के सुदूर पश्चिम के दार्चुला, बैतड़ी,
डडेलधुरा, कंचनपुर, कैलाली अछाम, बआडु, बाजुरा और डोटी में अत्यधिक श्रद्धा भाव से मनाया जाने वाला शिव-शक्ति उपासना का पर्व है। मुख्यतः गौरी अर्थात् पार्वती का महेश्वर संग विवाह के प्रसंग से संबंधित लोकगाथा परापूर्व काल से प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है। इसी प्रकार से कुमाऊं के पिथौरागढ़, चंपावत, उधम सिंह नगर, अल्मोड़ा, बागेश्वर आदि जिलों में भी इसी मान्यता पर आधारित यह उत्सव मनाया जाता रहा है।
नेपाल और भारत के मध्य प्रवाहित काली/महाकाली-शारदा नदी के दोनों तरफ के प्रमुख पर्वों में सांस्कृतिक पर्व के रूप में गौरा या गमरा/आठूं पर्व की अपनी ही विशेषताएं हैं। मुख्यतः शिव-पार्वती की पूजा आराधना कर मनाया जाने वाला यह पर्व नारी प्रधान पर्व के रूप में प्रख्यात है। अन्य सभी पर्वों की अपेक्षा इसमें आदर, विहार और संपूर्ण वातावरण व सात्विकता पर जोर दिया जाता है। बालक, जवान, वृद्ध नये परिधानों में सजकर, परस्पर या भैंट कर, अपनी पुत्री को घर में बुलाकर या माइके में आमंत्रित कर भोजन कराने की अच्छी परंपरा इस पर्व में देखने को मिलती है। नेपाल के इस क्षेत्र के लोग गौरा पर्व के सुअवसर पर परिवार जनों के साथ हर्षोल्लास के साथ पर्व का आनन्द लेते हैं।
गौरा पर्व भाद्र शुक्ल की षष्ठी से अष्ठमी तक विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर मनाया जाता है। पर्व के पहले दिन गौरा पर्व की श्रद्धालु महिलाऐं निराहार रह कर अपने घरों में ताबें या पीतल के बर्तनों में ‘बिरूड़ा’ अर्थात् पांच प्रकार के अनाज- गुरूंस, गहत, कलों, मास (उड़द) तथा गेहूं को गीत विधि पूर्वक गाकर पानी में मिलाती हैं। इन पंचाम युक्त बिरूड़ा को पवित्रीकरण करने हेतु गीत लय में प्रार्थना की जाती है। बिरूड़ा भिगाने का फाग कुछ इस प्रकार
से है-
‘‘ अइल को नौलो वरत मुइ लोली लै लिनौं,
महेश्वर गुसाई हमरा विनती सुणी दिय
खोजी दिय पंच बिरूड़ी गुंसाई,
सिलाई दिय कपड़ा …’’।
इसके दूसरे दिन गौरा मन्त्र ग्रहण की हुई सारी नारियां भीगे हुये बिरूड़ को
अत्यधिक आदर के साथ अपने सिर में ढोकर प्रार्थनायुक्त गीत गाते हुए जलाशय में पहुंच कई बार बिरूड़ा को धोकर स्वच्छ और पवित्र स्थान में सजाकर रखती हैं। ज्योतिष गणनानुसार किसी वर्ष बिरूड़ा
धोए हुए दिन ही खेत से गौरा (मुठा) को सजाकर ईश्वरीय नारा लगाते हुए ढोल बजाकर गौरा पूजन देने वाले घर या मन्दिर में रखते हैं। संध्या काल में गौरा व्रत धारण की हुयी महिलायें बिरूड़ा से गौरी पूजन करती हैं। किसी वर्ष उपरोक्त गौरा लाने तथा सप्तम्या धारण बिरूड़ा धोने के दूसरे दिन किया जाता है। इसका नामकरण क्रमशः धोई गौरा और वट गौरा किया जाता है। खेत से गोरा अन्दर लाने के दूसरे दिन ‘अठवाली’ या ‘आठूं’ मनाई जाती है। ये अठवाली या आठूं ही गौरा पर्व का खास दिन होता है। इस दिन प्रातः काल से ही महिलाऐं नये वस्त्र धारण कर तथा अपनी क्षमता के अनुसार आभूषण आदि से स्वयं को सुसज्जित कर गौरी पूजन हेतु खमादोवर, गौरी मां पूजन कर अन्यत्र ही मनमोहक शिव-पार्वती के विवाह का आनन्दोत्सव प्रारंभ होता है। गौरा देवी तथा महेश्वर दोनों की प्रतिमाओं को महिलाएंे अलग-अलग सिर में रखकर नचाती हैं। काफी देर तक यह नृत्य चलता रहता है। इसके पश्चात् गौरा देवी पूजन करते समय अर्पित बिरूड़ा, फलफूल आदि चादर में रखा जाता है और उत्तर, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा आकाश में पांच बार जोर से प्रसाद रखा हुआ चादर उछालकर उपर्युक्त पांचों तरफ समर्पण किया जाता है, जिसे ‘फल फटकुने’ या फल फटकना कहा जाता है।
गौरा/गोरा/आठूं नाम से प्रचलित इस महान पर्व का उद्देश्य लक्ष्मी नारायण,
राधा-कृष्ण, सीता-राम तथा उमा-महेश्वर हम सबके आराध्य होने के कारण उनकी तरह हमारे भी दाम्पत्य जीवन में चिरता, सौभाग्य वृद्धि आदि आती है। सत्य युग में अखण्ड सौभाग्य अनन्त दाम्पत्य सुख के लिए भगवती पार्वती ने उक्त दिनों में भगवान शंकर की विशेष पूजा आराधना और उपवास कर उनको पति के रूप में पाकर सौभाग्यवती और जगत जननी का पद प्राप्त किया। वैसे ही हमारे पति भी भगवान शंकर की तरह ही शक्तिशाली और हम भी भगवती पार्वती की तरह सौभाग्यवती और यशस्विनी हों, इस उद्देश्य के साथ व्रत रखा जाता है।
गौर अर्थात् उज्जवल, धवल, श्वेत, सफेद, सुन्दर, कल्याणकारी, शुभ लक्षण और अच्छे लक्षण के अर्थ में प्रयोग किया जाने वाला शब्द है, जो कि सात्विकता का प्रतीक है। गौर या गौरी शब्द सफेद गुण, प्रधान, स्वच्छ, निस्कपट, पाप रहित, परोपकारी, मनोहारिणी आदि अच्छे अर्थों में प्रयुक्त होता है। इस संदर्भ में भी गौरा पर्व सात्विकता, सादगीपन, पारिवारिक मिलन, परस्पर स्नेह एवं पे्रम, सुखी सम्पन्न दाम्पत्य जीवन के प्रेरणा स्रोत के रूप में मनाया जाने वाला नेपाल-भारत का साझा महान पर्व है।
पश्चिमी नेपाल या डोटी क्षेत्र में गौरा पर्व का मुख्य आकर्षण ‘डेउडा’ खेल और गीत है। इसमें पुरूष-पुरूष और नारी-नारी के समूह, गीत बनाकर मनोरंजनात्मक रूप में प्रश्नोत्तर करते हैं। ‘डेउडिया’ लोक कवि, गीतकार और वाकपटुता का उत्कृष्ट कलाकार ही होता है। लोक साहित्य और लोक संस्कृति के संरक्षण में डेउडिया (गीतकार) और डेउडा (खेल) का
अत्यधिक योगदान दृष्टिगोचर होता है। बालक, वृ¬द्ध सभी डेउडा खेल के प्रति
अत्यधिक लालायित रहते हैं। इस खेल में जीवन और जगत के अनेक पक्ष उजागर होते हैं। आशुकवि के रूप में चर्चित ‘गिदारा’ या ‘डेडडिया’ के गीतों का आधार मौलिक परंपरा ही है।
‘‘जंगल फुल्या का फूल जंगलै रनान
जै फूल लाई बास औछे मौरा म खनान्।।’’

  1. जंगल में फूले हुए फूल जंगल में ही रहते हैं, जिस फूल में सुगन्ध आती है,
    मधुमक्खी उसी का शहद खाती है।
    इस प्रकार के लोकगीतों के माध्यम से न केवल सांस्कृतिक विरासत का अस्तित्व बना रहता है, इनसे लोगों का साहित्यिक सांस्कृतिक स्वस्थ मनोरंजन भी होता है, साहित्य की भी वृद्धि होती है। जीवन के बहुविध पक्षों को समेटना और सैकड़ों की संख्या में खेल में सहभागी श्रद्धालुओं का मनोरंजन मात्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के स्तर को ऊंचा उठाना, लोक साहित्य का संवर्द्धन करना भी कहीं न कहीं गौरा पर्व का अंतर्निहित उद्देश्य होता है। इसी प्रकार सामाजिक एकता के रूप में इस पर्व का विशेष महत्व अपने ही प्रकार का रहा है।
    नेपाल-भारत की सीमा नहीं शारदा/महाकाली/काली से जितनी दूरी पर हम जायेंगे, उतना ही गमरा/गौरा/आठूं का सांस्कृतिक प्रभाव कम दिखाई देगा। यहीं के आसपास के क्षेत्रों में आर-पार इसका प्रभाव क्षेत्र अत्यधिक रहा है। डोटी प्रदेश या पश्चिम नेपाल के दार्चुल्ला (उत्तराखंड का धारचूला पार) बैतड़ी,
    डडेलधुरा और कैलाली, कंचनपुर जिलों में प्रायः एक-समान और बझांड., बाजुरा, डोटी, आदि जिलों में थोड़े बहुत अंतर के साथ यह त्यौहार मनाया जाता है। गौरा की घास से बनाई गई प्रतिमूर्ति उत्तराखंड की ही तरह कुछ गांवों में विगत में ‘सौं’ घास से बनाई गई मूर्ति को बाघ द्वारा खाने की किंवदन्ति के आधार पर कहीं पर मूर्ति सहित और कहीं पर बिना मूर्ति के ही गौरा पूजन सम्पन्न होता है। बझांड. के ल्यासी में कन्याओं द्वारा गौरा बनाने के बाद महिलाओं की सहभागिता में गौरेघर’ में गौरा लाकर लकड़ी की चैकी में गाय का गोबर और दूब घास के ऊपर दिया जलाकर सिर में रखकर उपवासरत सभी महिलाएं गौरा प्रतिमा सहित नृत्य करती हैं। वहां इस नृत्य को ‘चनयो पड़छनु’ कहा जाता है। फिर
    दूध-पानी की धारा से सूर्य पूजा कर अंदर जाते हैं। सभी अपने नए-नए दूब-धागों’ या ‘सप्ताकण’ गौरा में समर्पण कर फलफूल, पंचबिरुड़ा आदि से गौरा की पूजा करते हैं। इस प्रकार पूजा कर, स्वयं द्वारा ले जाए गए बिरुड़ा एकत्रित कर, सफेद कपड़े की गांठ बनाकर उसमें रखते हैं। उपावासरत महिलाओं को कोई न देखे, ऐसा विचार कर गोल घेरा बनाकर सफेद कपड़े के गांठ में रखे हुए ‘बिरुड़ा’ को चादर या कपड़ों से स्वयं को ढककर पांच बार बिरुड़ा की गांठ को पीछे रखकर, एक-दूसरे को दिया जाता है। इस दौरान का गीत कुछ इस प्रकार है-
    नाच नाच लौली गौरा तमेई बाटिय
    नाच तमारा नाचन ध्येकी तब हमें नाचु
    नाच नाच लौली गौरा नंचलैन नांचु।

    (पांच बार इधर-उधर, आगे-पीछे घूमकर कमर और सिर में हाथ लगाकर नाचते हैं।)
    इस प्रकार पंचमी के दिन पंच अन्न, बिरुड़ा भिगाना, षष्टी के दिन भिगाए हुए बिरुड़ा को उपवास रखकर, शुद्ध वस्त्र पहनकर, पूर्ण श्रृंगार कर, अपने इष्ट-मित्र, नाते संबंधी, कुटुम्ब-परिवार, पड़ोसी महिलाओं के साथ मिलकर नजदीक के पानी के धारे या नौले में जाकर बिरुड़ा धोए जाते हैं। यह कार्य मंगल गायन के साथ संपन्न होता है। बिरुड़ा धोकर, अपने-अपने घर जाकर पूजा कक्ष या मंदिर में जाकर इनको केले की पत्तियों में सुखाते हैं। सप्तमी के दिन गौरा पूजन का कार्य रात्रि में सम्पन्न होता है। दूसरे दिन अर्थात दुर्वाष्टमी के दिन सभी महिलाएं गौरा मंदिर या गौराघर जाकर गौरा की पूजा कर, गौरा की मूर्ति को आंगन में लाकर ‘अठवाली’ गाना शुरु करती हैं। अठवाली (आठौं) गाने महाराज रूप नारायण एवं मैनावती रानी के जीवन से लेकर उनकी पुत्री गौरा एवं महादेव के विवाह और उनके पुत्र गणेश की प्राप्ति तक के आठ खंडों में गाए जाने वाली
    धार्मिक गाथा है। जब गणेश का जन्म होता है, लालन-पालन के क्रम में अठवाली का वर्णन इस प्रकार है-
    हल्लोरी बाला हल्लोरी, हल्लोरी बाला हल्लोरी
    यो मेरो बालो (बच्चा) लिसिनो लोटलो ज्युले।
    लिसिनो लोट्लो सासु ज्यु ले हेरि दिथ्यो बालो
    हेरि दिथ्यो नन्द ज्युले हेरि दिथ्यो बालो
    हेरि दिथ्यो बालो हल्लोरी बाला हल्लोरी
    सासु ज्यु कां गए बाला नन्द ज्यु कां गए।

    बच्चों के पालन-पोषण में परिवार के सहयोग की आवश्यकता होती है। एकल परिवार में बच्चे अकेले ही रह जाते हैं। संयुक्त परिवार में सास, ननद, आदि की बच्चे की परिवरिश में सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह हमारी पारिवारिक पारिवारिक पृष्ठभूमि है। इस व्यवस्था के तार हमारी संस्कृति, हमारे वैभवशाली अतीत से जुड़े हैं। आजकल एकल परिवार की अवधारणा से बच्चों के मन-मस्तिष्क भी कुंठित पड़ते जा रहे हैं। बच्चे के विकास में कौन से तत्व अपनी भूमिका निभाते हैं, इसे मां से ज्यादा भला कौन जान सकता है। इस खंड में माता पार्वती पुत्र गणेश को बताती है कि उसके बचपन में, उसके लालन-पालन में परिवार के बड़े सदस्यों की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पार्वती, गणेश को समझाकर कहती हैं कि बड़े होने पर तुम अपनी दादी (आमा) और बुआ के घर अवश्य जाना।
    गौरा पर्व नारी अस्मिता और स्वाभिमान पर्व के रुप में देखा जाता है। मूलतः पश्चिम नेपाल और उससे लगे हुए उत्तराखंड के सांस्कृतिक-भौगोलिक क्षेत्र में अपना प्रभाव रखने वाले इस पर्व की आत्मा के रूप में अठयावली/आठों/अठवाली/अष्टावली/अष्टमी गीत ही रहा है। बिरुड़ा पंचमी से लेकर पूर्णिमा तक 10 दिन तक मनाया जाने वाला पर्व नारियों के द्वारा रचित, संकलित श्रुति परंपरा में आधारित इन गीतों में वेद का मर्म, स्मृतियों की सूक्ति, तथा पुराण और इतिहास की कथाएं देखने को मिलती हैं। पेश है आठ खंड (आवली) की संक्षिप्त चर्चा-
    प्रथत आवली- इसमें अपने-अपने इष्ट कुल देवता सहित विभिन्न देवी-देवताओं का स्मरण किया जाता है। इसमें सत्य, ज्ञान और प्रकार का प्रतीक सूर्य, चन्द्र तथा गंगा, जमुना, सरस्वती आदि नदियों का भी स्मरण किया जाता है।
    द्वितीय आवली- इस खंड में रूप नारायण (हिमालय) और मैना का विवाह, मैनारानी के गर्भवती होने का वर्णन किया जाता है। रूप नारायण और मैना की संतति के रूप में पुत्री गौरा का जन्म होता है और महेश्वर के साथ गौरा की शादी का संयोग बन जाता है।
    तृतीय आवली- इस आवली में कन्या का जन्म होना, वरदान के अनुसार कन्या का नाम गौरा रखा जाता है। इसमें ज्योतिष के अनुसार कन्या के बहुत ही भाग्यशाली होने और ईश्वर पति पाने की चर्चा की जाती है।
    चतुर्थ आवली- इसमें कन्या के छह महीने पूर्ण होने पर अन्नप्राशन किए जाने और आठ वर्ष की कन्या का विवाह योग्य होने का वर्णन है परंतु गौरा ने तपस्या करने की इच्छा अपने पिता के सम्मुख प्रकट की और गंगा तट पर पहंच कर घोर तपस्या प्रारंभ कर दी, ऐसी चर्चा इस आवली में देखने को मिलती है।
    पंचम आवली- पंचम आवली में गंगा तट पर तपस्यारत पार्वती की परीक्षा लेते शंकर नदी तट पर बांसुरी बजाते हुए पहंुचते हैं और इधर गौरा बीणा बजा रही होती है। दोनों में परिचय होने के क्रम में पहले तो गौरा अनेक बहाने बनाती है और बाद में यथार्थ बताती है कि रूप नारायण उनके पिताजी और मैना माताजी हैं तथा दामोदर भाई है। यह जानकर शंकर खुश होते हैं। शंकर द्वारा विवाह प्रस्ताव रखने पर गौरा मां-बाप की स्वीकृति मिल जाने पर विवाह की बात करती है। मां-बाप गंगा तट पर पहंुच जाते हैं और गौरा-महेश्वर का गोपनीय रूप से विवाह होता है परंतु औपचारिक विवाह हेतु शंकर जी गौरा के घर जाकर उनके पिता से कन्या मांगने का निर्णय करते हैं।
    षष्टी आवली- बड़ुभाट रूपी शंकर, पार्वती से उनके घर जाने का रास्ता पूछते हैं। पार्वती उनको निर्देशित करती है। शंकर रास्ते में जोगी रूप धारण कर पार्वती (गौरा) के घर पहंुचकर भिक्षा मांगने लगते हैं। भिक्षा में गौरा की मां मैना अनेक वस्तुएं देने को राजी होती है, परंतु शंकर पार्वती को मांगते हैं, लेकिन मैना अनेक बहाने बनाने लगती है। बाद में शंकर अपने वास्तविक रुप में प्रकट होते हैं। तब जाकर उनका आदर-सत्कार किया जाता है और पार्वती की शादी भाद्र सप्तमी के दिन होना निश्चित होता है।
    सप्तम आवली- गौरा महेश्वर का विवाह भाद्र सप्तमी, मंगलवार के दिन निश्चित होने की खबर सभी देवी, देवताओं को होती है। सभी को निमंत्रण भेजा जाता है। अपने-अपने वाहन से सभी आते हैं। विवाह के दिन सभी देवता ….(आभूषणयुक्त) होकर आते हैं। इसी करण इस दिन को ….. सप्तमी कहा जाता है। गौरा-महेश्वर के प्रसाद स्वरुप ‘दुब्धागो और ‘सप्तम्या’ लगाया जाता है। पुरुषों के जनेऊ की तरह महिलाओं के लिए ‘दुब्धागो’ और सप्तम्या का महत्व है। इस प्रकार गौरा-महेश्वर की शादी की तैयारी का वर्णन इस आवली में किया जाता है।
    अष्टम आवली- शिव-गौरा के विवाह में पधारे बाराती भोजन ग्रहण करते हैं। कन्या (गौरा) को आभूषणादि पहनाकर शिव जी को कन्यादान देने का कार्य प्रारंभ होता है। दोनों की पूजा कर अष्टमी के दिन विदाई की जाती है। विवाहोपरांत गौरा-महेश्वर कैलास पर्वत पहंुचते हैं, जहां आनंद के साथ रहने लगते हैं। तत्पश्चात पुत्र के रुप में गणपति का जन्म होता है।
    गौरा-महेश्वर के विवाह पश्चात गणेश के जन्म लेने तक का वर्णन अष्टवली में किया गया है। इस प्रकार अष्टावली पूरे पर्व की आत्मा है।

    गौरा पर्व कृषि कार्य के समापन के पश्चात वर्षात के समय नेपाल-भारत की सीमावर्ती काली नदी के दोनों तरफ अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाने वाला पर्व है। पुरुषों की भागीदारी होने के बावजूद यह नारी पर्व के रूप में अधिक प्रचलित है। भारत के उत्तराखंड में यह धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व है परंतु इसका उद्गम स्थल नेपाल का पश्चिमी क्षेत्र है। गोरखाओं के देहरादून विजय के समय बड़ी संख्या में नेपाली उत्तराखंड में बसने लगे। सन् 1750 से 1816 की सुगौली संधि होने तक कुमाऊं-गढ़वाल गौर्खा साम्राज्य के रूप में रहने के कारण भी नेपाली संस्कृति का प्रभाव इन क्षेत्रों में अधिक पड़ा। गौरा पर्व नेपाल-भारत के मध्य असंख्य समानधर्मिता की कड़ियों के साथ ही महत्वपूर्ण अंतर्संबंधित सामाजिक- सांस्कृतिक तत्व के रुप में स्थापित है और नेपाल- भारत के सीमावर्ती अंचल में सांस्कृतिक एकता के रूप में साफ दिखाई देता है।

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