कुमाँऊ के पौराणिक देवता एवं उनके पूजन क्षेत्र ।

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छुरमल
इस लोक देवता के अधिकाँश पूजास्थल, पिठौरागढ़ जनपद के सीरा और अस्कोट क्षेत्र के गाँवों में पाये जाते हैं। इसे बड़ा प्रभावशाली देवता माना जाता है। इसका प्रसिद्ध मन्दिर, अस्कोट के गर्खा गाँव के ऊपर धनलेक पर्वत के शिखर पर है जहाँ पर बहुत बड़़ा मेला लगता है।ठस देवता की गाथा के अनुसार, यह धूमाकोट के कालसिन का पुत्र था। कालसिन का विवाह रिखीमन की पुत्री ह्यूँला के साथ हुआ था जो उस समय एक बालिका ही थी। कालसिन उसे घर पर छोड़कर देवताओं की सभा में चला गया। कुछ वर्षों बाद जब वह लौटकर आया तो ह्यूँला पूर्ण यौवन प्राप्त कर चुकी थी। फिर भी उसने अपनी पत्नी पर ध्यान नहीं दिया। इस पर ह्यूँला ने उस पर अपनी उपेक्षा करने का आरोप लगाया। इससे नाराज होकर कालसिन उसे छोड़कर वापस देवसभा में चला गया। इधर ह्यूँला जब रजस्वला हुई तो उसकी सास ने उसके रजःस्नान के लिये ऐसा स्नानागार बनाया जिसमें केवल एक सूक्ष्म छिद्र रह गया था। एक बार के रजःस्नान के समय सूर्य की एक किरण उस पर पड़ गई जिससे वह गर्भवती हो गई।
ह्यूँला के गर्भवती होने की सूचना का पत्र, अपने तोते के द्वारा, कालसिन की माता ने देवसभा में बैठे अपने पुत्र को भेजा जिसे पढ़कर वह तुरन्त अपने घर की ओर चल पड़ा। घर आकर उसको वास्तविकता का पता लग गया और वह पुनः देवपुरी लौट गया। इधर कालसिन की माता ने ह्यूँला को घर से निकाल दिया। प्रसवपीड़ा से त्रस्त ह्यूँला ओखलसारी (जिस झोपड़ी में ओखल होता है) में जाकर बैठ गई। वहीं पर आधीरात के समय उसने एक पुत्र को जन्म दिया। जन्मते ही उस पुत्र ने अपनी माता को व्याकुल न होने को कहा और अपने पिता के बारे में पूछा। माता ने उसे कालसिन के बारे में बताया कि वह इन्द्रपुरी में देवताओं की सभा का दीवान है। वह शिशु अपनी नाभिनाल को कमर में लपेट का शीघ्र इन्द्रपुरी पहुँच गया। उसके वहाँ पहुँचते ही इन्द्रपुरी डोलने लगी। जब उसने अपने पिता के बारे में कहा तो कालसिन ने पहले तो उसे अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया। फिर उसने एक एक करके उसके सामने कई शर्तें रखी जिन्हें वह बालक पूरा करता गया। अन्त में कालसिन को उसे अपने पुत्र के रूप में मान्यता देनी ही पड़ी़, साथ ही यह भी कहा कि दोनों एक साथ कभी भी नहीं रहेंगे। यही कारण है कि पिता-पुत्र होते हुये भी दोनों को एक ही मन्दिर में स्थापित नहीं किया जाता।

जगन्नाथ
पिठौरागढ़ जनपद के मड़ मानले नामक गाँव के निकट जगन्नाथ नाम के देवता की पूजा की जाती है। यहाँ पर अनन्त चतुर्दशी के दिन क्षेत्र का एक बड़ा मेला लगता है। इस देवता का एक मन्दिर कालीनदी के तट पर स्थित बलतड़ी नामक गाँव में भी है जहाँ पर विषुवत संक्रान्ति की पूर्वसन्ध्या को रात्रि का मेला लगता है।

जिमदार
चम्पावत जनपद के कई गाँवों में, विशेषकर मुख्यालय के आसपास के गाँवों में ‘जिमदार‘ (कृषक, भूस्वामी) नाम से एक देवता की पूजा की जाती है। यह किसी भी व्यक्ति को परेशान नहीं करता है। रुष्ट होने पर यह ग्रामवासियों की कृषि को जंगली पशु-पक्षियों द्वारा नष्ट कराता है। मान-मनौवल कर तथा वर्ष में एक बार इसकी पूजा करने से यह प्रसन्न हो जाता है। इसकी पूजा में बकरे की बलि देने का विधान भी है। इसके पूजास्थल पर कोई मूर्ति नहीं होती। किसी वृक्ष के नीचे, इसके प्रतीक स्वरूप पाषणख्ण्ड रख कर उनकी पूजा की जाती है। इस प्रकार यह, अन्य क्षेत्रों में पूजे जाने वाले ‘भूमिया‘ (भूमि का स्वामी देवता) का ही रूप है।

जैचम निर्मांसी
चम्पावत जनपद के पश्चिमी भाग मे स्थित लधौनधूरा पर्वत के शिखर पर ‘जैचम निर्मांसी‘ के नाम से पूजे जाने वाले देवता की, निकटवर्ती ग्रामों में निवास करने वाले बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा किया करते हैं। यहाँ पर कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी की रात्रि तथा दूसरे दिन पूर्णिमा को बहुत बड़ा मेला लगता है। चतुर्दशी की रात्रि को आसपास के गाँवों से देवता का डोला लाया जाता है।

जोगीराठ
‘राठ‘ का अर्थ एक वंश के लोगों का समूह होता है। इस प्रकार ‘जोगीराठ‘ के नाम से पूजित एक देवता न होकर, देवयोनि को प्राप्त एक ही वंश के कई व्यक्तियों से है। कहा जाता है कि पूर्वकाल में, पिठौरागढ़ के पश्चिमोत्तर में स्थित ह्यूंपानी पर्वत के एक शिखर, उदयपुरकोट में ‘विजयबम‘ नाम का एक राजा रहता था। एक बार जब राजा शिकार खेलने के लिये कहीं जाने लगा तो उसने अपने ‘कोट‘ की रक्षा के लिये, सिद्धिप्राप्त सिरपाल, घरपाल, सिद्धपाल आदि कुछ जोगियों को नियुक्त कर दिया। राजा की अनुपस्थिति में, गंगोलीहाट के निकट मणकोट में रहने वाले राजा ने उदयपुरकोट पर आक्रमण कर दिया, जिसमें सभी जोगी मारे गये और भूतयोनि में चले गये। लोगों ने इनकी ‘जोगराठ‘ के नाम से पूजा प्रारम्भ करदी और इनके पूजास्थल स्थापित कर दिये। वर्तमान में मुख्य रूप से इनकी पूजा रतवाली के जोशी, भुरमुणी के खड़ायत, ढुंगागाँव के ग्वाँला, सिकड़ानी के बोरा तथा मल्लाबैड़ी कहे जाने वाले शिल्पकार किया करते हैं। ‘जोगीराठ‘ की पूजा में मझेड़ा के पाटनी जाति, जो बमराजा के दीवान थे, की उपस्थिति वर्जित होती है।

त्यन्दल्मा
सीमान्त की पट्टी ब्याँस में पूजा जाने वाला एक स्थानीय देवता है, जिसकी पूजा लमारी और बूदी ग्रामों में की जाती है।

त्यूनर (त्यून्द्र)
चम्पावत जनपद के कई गाँवों, विशेषकर तल्लादेश में इस देवता की पूजा की जाती है। इसे उग्र स्वभाव का माना जाता है।

थत्याल (भुम्याल)
पिठौरागढ़ जनपद में, जोहार के मिलम गाँव के निवासीं, प्रमुख रूप से सयाना और पाँगती जातियों द्वारा पूजित, ‘थात‘ अर्थात् पैतष्क भूमि का अधिष्ठाता ‘थत्याल‘ या भूमि का स्वामी ‘भुम्याल‘ कहा जाता है। इस नाम का अलग से कोई देवता नहीं होता है। परम्परा से, ग्राम की भूमि या थात का स्वामी जिस देवी या देवता को माना गया है उसे ही ‘थत्याल-भुम्याल‘ के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इसके पूजास्थलों में बकरों की बलि दी जाती है। बलिपूजा प्रायः जेठ के महिने में होती है। फसल के पकने के बाद इसकी पूजा अनिवार्य रूप से की जाती है। इसे पशुधन का स्वामी भी माना जाता है।े दुधारू पशु के ब्याने पर बाईसवें दिन पशु के दुग्धउत्पाद भी इसी देवता को अर्पित किये जाते हैं। इस देवता के बारे में यह भी मान्यता है कि अवर्षण होने पर इसकी पूजा करने से अवश्य वर्षा होती है। शेष कुमाऊँ में इसे ‘भूमिया‘ कहा जाता है। ग्राम में उत्पन्न होने वाली प्रत्येक वस्तु, सर्वप्रथम इसी देवता को अर्पित की जाती है। इसके उपरान्त ही ग्रामवासी उनको अपने उपयोग में लाते हैं।

दाणू
बागेश्वर जनपद के दानपुर तथा उससे लगे पिठौरागढ़ के तल्ला जोहार और चमोली के ऊपरी पिण्डर क्षेत्र में ‘दाणू‘ देवता के कई रूपों की पूजा की जाती है। इनमें प्रमुख लालदाणू, धामदाणू, वीरदाणू, लाटूदाणू, त्यूणादाणू, रजकोटीदाणू और मलियादाणू आदि हैं। इनको दानववंशीय लोकदेवता माना जाता है।

देवगुरु
जनपद नैनीताल की पट्टी ‘रौ‘ में एक लम्बी पर्वत श्रृंखला है जिसके उच्चतम शिखर पर ‘देवगुरु‘ के नाम से एक लोकदेवता का पूजन किया जाता है। लोग इसे देवताओं के गुरु बृृष्हस्पति भी मानते हैं जो लोकदेवों को पौराणिक देवों से जोड़ने की, त्रुटिपूर्ण मानसिकता का द्योतक प्रतीत होती है। इसका पूजास्थल, एक ऊँचे चबूतरे पर स्थापित शिलाखण्ड के रूप में है। देवता के आदेशानुसार यहाँ पर किसी मन्दिर अथवा अन्य प्रकार के छोटे-बड़े भवन का निर्माण वर्जित है। साथ ही इसके चारों ओर, लगभग सौ मीटर के घेरे के भीतर स्त्री जाति और सवर्णेतर जाति के व्यक्तियों का प्रवेश निषिद्ध है। इस पर्वत के दोनों ढालों पर निवास करने वाले ग्रामवासी, नया अनाज पैदा करने के बाद नवान्न तथा गाय-भैंस के ब्याने के बाद उसका दूध सर्व प्रथम इस देवता को अर्पित करते हैं उसके बाद ही अपने उपयोग में लाते हैं। इसे अर्पित पदार्थ का वह अंश, जो पुजारी द्वारा ‘प्रसाद‘ के रूप में दिया जाता है, स्त्रीजाति को नहीं दिया जाता। इस देवस्थल में पकाये जाने वाले खाद्य पदार्थों में नमक तथा तेल का प्रयोग भी वर्जित होता है। यहाँ पर केवल घी में मीठे पकवान ही पकाये खाये जाते हैं।

द्यौलसमेत
पिठौरागढ़ की ‘सोर‘ घाटी के जल का निकास दो प्रमुख ‘गाड़ों‘ या लघु नदियों द्वारा किया जाता है। ठूलीगाड़ और रन्धौला नामक इन दोनों लघु-नदियों के संगम स्थल, ‘सेराद्यौल‘ पर, श्मसान-वासी महादेव शिव के साथ-साथ, घाटी के, प्रमुख बाईस ग्रामों के निवासियों द्वारा, श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजे जाने वाले लोक देवता ‘द्यौल समेत‘ का पूजा स्थल है। किम्बदन्ती है कि, पूर्वकाल में, ‘ठूलीगाड़‘ और ‘रन्धौला गाड़‘ के किनारे स्थान-स्थान पर ‘राकस‘ (राक्षस) और ‘भूत‘ रहते थे जो निकट के ग्रामवासियों को उत्पीड़ित करते थे। इन ‘राकस-भूतों‘ को, ‘द्यौल समेत‘ देवता ने अपने गणों की सहायता से वश में किया था। क्षेत्र के निवासियों ने, देवता को अपना त्राणकर्ता मानकर, अपने अपने गाँव में उसके ‘थान‘ और मन्दिर बनाये। उस की पूजा-अर्चना प्रारम्भ कर दी। उसके नाम से धूनी जलाकर, ‘जागर‘ का आयोजन करना प्रारम्भ कर दिया। ‘द्यौल समेत‘ देवता का सम्बन्ध, ‘बम‘ राजाओं से भी जोड़ा जाता है जिन्होंने कुछ वर्षों तक ‘सोर‘ में राज किया था। वह काली नदी के पूर्व में स्थित पुरचुणी नामक स्थान से ‘सोर‘ में आये थे। उन्होंने अपनी राजधानी पहले उदयपुर और कालान्तर में बमधौना पहाड़ी के षिखर पर स्थापित की। वे अपने इष्ट देवता ‘कालसिल‘ के पूजन के लिये, प्रतिवर्ष अपने मूल स्थान पुरचुणी जाते थे।
कहा जाता है कि बमधौना में निवास करने वाले, इस वंश के किसी राजा का पुत्र गलगण्ड (घेघा) नामक रोग से ग्रसित हो गया। उसके शरीर में अन्य कुरूपतायें भी प्रकट होने लगीं। सभी उपचार व्यर्थ होगये। अब राजा को भी अपना इष्ट देवता याद आया जो कई कोस दूर पुरचुणी में निवास करता था। देवता के पूजन के लिये, राजा ने अपने पुजारी ब्राह्मण को, आवश्यक पूजा-सामग्री के साथ पुरचुणी भेजा और उससे, रोग के सम्बन्ध में देवता का आदेष प्राप्त करने को कहा।
पुजारी ब्राह्मण ने, पूजा सामग्री और अनुचरों के साथ पुरचुणी के देव-मन्दिर में पहुँच, पूजा-अर्चना, जागरण आदि आवष्यक अनुष्ठान किये और राजा की व्यथा देवता को सुनाई। देवता ने अपने ‘धामी‘ के माघ्यम से पुजारी ब्राह्मण को ध्वजा और कुछ अन्य प्रतीक देकर निर्देेशित किया, कि भविष्य में बमधौना के राजा को अपने इश्टदेवता की पूजा के लिये पुरचुणी नहीं आना पड़ेगा। देवता, उसकी पूजा ग्रहण करने के लिये, स्वयं उसके निकट आकर रहेगा। पुजारी ब्राह्मण के, लौटकर बमधौना पहुँचने तक, राजपुत्र का रोगमुक्त होना ही देवता के आगमन की सूचना होगी।
पुजारी ब्राह्मण, देव-प्रदत्त सामग्री लेकर लौट आया। जब वह, ठूलीगाड़ और रन्धौला के संगम क्षेत्र में पहुँचा तो, शौचादि कृत्यों से निवृत होने के लिये, उसने वह सामग्री, एक स्वच्छ स्थान पर रख दी। निकट ही श्मसानवासी शिव का छोटा सा मन्दिर था। जब पुजारी, संगम के जल से शुद्ध होकर उस स्थान पर पहुँचा तो उसने ‘आकाशवाणी‘ सुनी कि ‘देवता को यह स्थान अच्छा लगा है और वह इसी स्थल पर रहना चाहता है। पुजारी ब्राह्मण ने राजा के पास जाकर उसे सम्पूर्ण विवरण सुनाया और देवता की इच्छा से अवगत कराया। इतने समय में राजपुत्र भी रोगमुक्त हो चुका था। राजा ने सपरिवार, सेवकों और अन्य परिजनों के साथ, संगम-स्थल के निकट पहुँचकर, अपने इष्ट देवता को नियत स्थान पर प्रतिष्ठित कर, विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।
‘बम‘ वंशीय राजाओं का यह इष्ट-देवता, जो अपने मूलस्थान, पुरचुणी में ‘कालसिल‘ नाम से पूजा जाता है, ‘सेराद्यौल‘ और ‘सोर‘ के ग्रामों में ही नहीं वरन् अस्कोट, काली कुमांऊ और गंगोली आदि दूर-दूर के क्षेत्रों केे गाँवों में भी, ‘कालसिल‘ या ‘कालसिन‘ या ‘कालछिन‘ नाम से ही पूजा जाता है। यह खुले आसमान के नीचे रहने वाला देवता है। सोर के अधिकाँश गाँवों में ‘आठूँ‘ पर्व के लिये बनाये जाने वाले, ‘गमरा-महेसर‘ के विग्रहों को ‘कालसिन‘ देवता के ‘थान‘ में रखकर विसर्जित करने की परम्परा है।
‘सैनीसोर‘ में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी और पूर्णमासी को, इस लोकदेवता की ‘चैतोल‘ (चैत के महिने में की जाने वाली देवता की शोभायात्रा) का जलूस निकाला जाता है जिसे ‘सोर‘ के केवल बाईस गाँवों में ही घुमाया जाता है। मान्यता है कि ‘चैतोल‘ घुमाने से, क्षेत्र, भूत-प्रेत और आधि-व्याधियों से मुक्त हो जाता है। ग्रामवासी, उनके पशु तथा खेत-खलिहान सुरक्षित रहते हैं।

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