कुमाऊं को खौफ़नाक बाघों से मुक्ति दिलाने वाले जिम कार्बेट का जन्मदिन आज

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25 जुलाई 1875 को नैनीताल में जन्मे जिम कॉर्बेट ने 1905 में चम्पावत में अपने जीवन के सबसे खूँखार नरभक्षी बाघ को मार गिराया था । 19वीं सदी में नेपाल और भारत के उत्तराखंड के कुमाऊं के लोगों के लिए बड़ा खौफनाक समय था. यहां के लोग अपने घरों से निकलने में डरते थे. जंगलों में लकड़ियां काटने जाने में डरते थे. हर एक तरफ दहशत का माहौल था.

तब के लोग तो ये तक मानने लगे थे कि चंपावत गांव पर  किसी ‘चुड़ैल’ का साया पड़ गया है, जो लोगों के खून की प्यासी है. लेकिन लोगों की जान का दुश्मन कोई भूत नहीं बल्कि एक टाइगर था, जिसने लगभग 436 लोगों को मौत के घाट उतारा था. हालांकि कहा जाता है कि ये आंकड़ा करीब 500 था. लेकिन मशहूर शिकारी और बाद में बाघों के सबसे बड़े संरक्षक बने जिम कॉर्बेट ने इस बाघिन को मार कर हजारों लोगों को नई जिंदगी दी.

चंपावत की मैन ईटर को पकड़ पाना हर किसी के बस की बात नहीं थी. जब बड़े से बड़े शिकारी फेल हो गए थे, तो नेपाल की आर्मी ने ये मिशन हाथ में लिया.

आर्मी भी इस बाघिन को मार गिराने में नाकाम रही, लेकिन इसने ये मुसीबत नेपाल से भारत को ओर खदेड़ दी. ये इतिहास में पहला मौका था जब किसी मैन ईटर को मारने के लिए आर्मी को बुलाया गया हो.

नेपाल में करीब 200 लोगों का शिकार किया और जंगलों की घनी झाड़ियों में ले जाकर मजे से इंसानी मांस का लुत्फ उठाया. आतंक का माहौल इस चरम पर था कि लोगों ने घरों से निकलना बंद कर दिया.

Jim Corbett in kumaun
Jim Corbett in kumaun

दिन की रोशनी में होने लगा शिकार

जब ये मुसीबत भारत आई तब तक इंसानों का डर इसके दिल में पूरी तरह से खत्म हो चुका था. बाघिन इतनी खौफनाक हो चुकी थी कि वो शाम और रात के वक्त कम रोशनी होने का इंतजार किए बिना, दिन की रोशनी में ही लोगों को अपना निवाला बनाने लगी. लेकिन दिन की रोशनी में भी इस बाघिन को पकड़ पाना आसान नहीं था.

खुद जिम कॉर्बेट को इसका शिकार करने में काफी समय लग गया था. बाघिन लुक्का-छुप्पी का खेल खेलने में माहिर हो चुकी थी और बार-बार कॉर्बेट को ये समझाती थी कि ‘तू डाल-डाल तो मैं पात-पात’. बाघिन एक इलाके में शिकार नहीं करती थी. कभी शिकार किसी गांव में तो कभी उस गांव से 10 गांव दूर किसी मासूम को अपना शिकार बनाती थी.

कॉर्बेट के अलावा शायद ही किसी शिकारी में ये समझ थी. कहते हैं जिम कॉर्बेट अपनी राइफल के साथ पैदल ही कुमाऊं के जंगलों में घूमते थे और उन्होंने कई रातें इस जंगल में अकेले बिताई थी. ऐसे में टाइगर के बारे में उनसे ज्यादा शायद ही किसी को समझ होगी.

आखिर कैसे मारी गई चंपावत की मैन ईटर

चंपावत की आदमखोर को पकड़ने के लिए जिम कॉर्बेट ने कई प्लान बनाए. लेकिन हर बार वो उन्हें इस बात का एहसास कराती थी कि ये जंगल उसका है और यहां उसी का राज चलता है. चंपावत की इस ‘चुड़ैल’ का आखिरी शिकार 16 साल की एक लड़की बनीं थी, जोकि दिन के समय अपने गांव के पास जंगल में लकड़ियां इकट्ठा करने गई थी. जैसे ही बाघिन के हमले की खबर फैली कॉर्बेट मौके पर पहुंचे और उन्होंने खून के धब्बों का पीछा किया.

बाघिन अपने शिकार को जंगल में काफी अंदर ले गई थी और कॉर्बेट लाश के घसीटे जाने के निशानों का पीछा करते-करते बाघिन के करीब पहुंचे. लेकिन रात घिर जाने के कारण कॉर्बेट ने बाघिन की मांद के पास ही रुकने का फैसला किया और अगली सुबह बाघिन को गोली मार कर, सभी को राहत की सांस दी.

क्या कहता था बाघों का सबसे बड़ा शिकारी

जिम कॉर्बेट ने अपनी जीवन में कई किताबें लिखीं, जिनमें मैन ईटर टाइगर और लेपर्ड के साथ मुठभेड़ के उनके ढ़ेरों किस्से हैं. 1907 से 1938 के बीच उन्होंने करीब 33 मैनइटर्स को मौत के घाट उतारा था. लेकिन जब भी जिम किसी टाइगर या लेपर्ड को गोली मारते थे, अंदर से वो उतने ही दुखी होते थे.

वो ये बात भली भांति समझते थे कि जिस दिन भारत के जंगलों से बाघ खत्म हो जाएंगे. उस दिन भारत के जंगल भी खत्म हो जाएंगे. वो हमेशा कहते थे कि कोई भी बाघ या तेंदुआ खुद से आदमखोर नहीं बनता. ऐसा शायद ही होता हो, जब कोई जानवर खुद से नरभक्षी बनता हो.

जिम कॉर्बेट ने अपनी पुस्तक मैन इटर्स ऑफ कुमाऊं में ये बताया है कि जब बाघ खुद अपने कुदरती शिकार को मार पाने में सक्षम नहीं होते तभी वो इंसानो  को मारने लगते हैं चंपावत की बाघिन के साथ भी ऐसा ही था.उसके दाईं तरफ के ऊपर और नीचे दोनों ही कैनाइन दांत टूट चुके थे. जिस कारण वो हिरण, वाइल्ड बोर (जंगली सुअर), सांभर आदि का शिकार नहीं कर पा रही थी ।

जिम कार्बेट एक कुशल शिकारी होने के साथ  एक अत्यन्त प्रभावशील लेखक भी थे। शिकार-कथाओं के कुशल लेखकों में जिम कार्बेट का नाम विश्व में अग्रणीय है। उनकी ‘भाई इण्डिया’ पुस्तक बहुत चर्चित है। भारत-प्रेम उनका इतना अधिक था कि वे उसके यशगान में लग रहते थे। कुमाऊँ और गढ़वाल उन्हें बहुत प्रिय था। ऐसे कुमाऊँ – गढ़वाल के हमदर्द व्यक्ति के नाम पर गढ़वाल-कुमाऊँ की धरती पर स्थापित पार्क का होना उन्हें श्रद्धा के फूल चढ़ाने के ही बराबर है।

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