वनौषधियों की खेती कैसे करें

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उत्तराखण्ड आदि काल से ही महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियों व अन्य उपयोगी वनस्पतियों के भण्डार के रूप में विख्यात है। इस क्षेत्र में पाये जाने वाले पहाड़ों की श्रृंखलायें, जलवायु विविधता एवं सूक्ष्म वातावरणीय परिस्थितियों के कारण प्राचीन काल से ही अति महत्वपूर्ण वनौषधियों की सुसम्पन्न सवंधिनी के रूप में जानी जाती हैंै। प्राचीन काल से ही वनस्पतियों का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार हेतु किया जाता है। इसका प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद (3500 ई. पूर्व) में मिलता है। देश में उपलब्ध वनस्पति प्रजातियों में से लगभग 1000 किस्म के पौधे अपने विशेेष औषधीय गुणों के कारण विभिन्न-विभिन्न औषधियों में प्रयुक्त होते हैं, और इनसे लगभग 8000 प्रकार के मिश्रित योग (कम्पाउण्ड फारमुलेन्सस) बनाये जाते हैं। जिनका विभिन्न रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है।
देशी चिकित्सा पद्धति जैसे आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी व प्राकृतिक चिकित्सा में प्रयुक्त दवाओं में उपयोग किये जाने वाले औषधीय पौधे विभिन्न जलवायु में फलते-फूलते हैं। इन पौधों के विभिन्न भाग जैसे जड़, तना, छाल, पत्तियां, फल, फूल व बीज आदि जंगलों से ही एकत्र किये जाते हैं। अभी तक अधिकांश वनौषधियों का प्राकृतिक स्रोतों से ही दोहन किया जा रहा है, फलस्वरूप अनेक महत्वपूर्ण औषधीय पौधे विलुप्त होने की कगार पर आ गये हैं। अगर अभी भी इनके संरक्षण हेतु उचित कदम नहीं उठाये गये तो ये वनस्पतियां सदैव के लिए विलुप्त हो जायेंगी। इन औषधीय पौधों को उगाने से ही इन्हें विलुप्त होने से बचाया जा सकता है। आज समय की मांग है हिमालयी क्षेत्रों में विद्यमान वनौषधियों के सम्वर्धन एवं संरक्षण की, जिनसे कृषिकरण द्वारा इन बहुमूल्य वनस्पतियों का संरक्षण किया जाय तथा इन्हें व्यवसायिक तथा अनुपूरक आय के अनुकूल विकसित किया जाय। ताकि क्षेत्र में जड़ी-बूटियों के कृषिकरण से वनांे पर पड़ने वाले संग्रहण के दबाव को कम किया जा सके तथा बाजार मांग की आपूर्ति में सुनिश्चित हो सके।

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उत्तराखण्ड के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्र में पायी जाने वाली वनौषधियाँ
उत्तराखण्ड अपनी विविधता से भरपूर जलवायु एवं मृदा आदि कारकों के कारण जड़ी-बूटियों का अपार भंडार समेटे हुए है। वातावरणीय भिन्नताओं एवं समुद्र सतह से ऊंचाई को आधार मानकर इस क्षेत्र को चार भागों में बांट सकते हंै।
1. तराई-भाभर क्षेत्र: यह क्षेत्र समुद्र सतह से 800 फिट तक ऊंचाई वाला क्षेत्र है।
2. नदी घाटी क्षेत्र: यह क्षेत्र समुद्र सतह से 800 से 4000 फिट तक ऊंचाई वाला क्षेत्र है।
3. लघु हिमालय क्षेत्र: 4 हजार फिट से 9 हजार फिट ऊंचाई वाले क्षेत्र को इस श्रेणी में रखा गया है।
4. महा-हिमालय क्षेत्र: नौ हजार फुट से 14 हजार फुट ऊंचाई वाला क्षेत्र महा-हिमालय कहलाता है।
अपनी विशेष वातावरणीय अनुकूलता के कारण उपरोक्त चारों क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार की औषधीय वनस्पतियां अपने प्राकृतिक वास में पायी जाती हंै। यदि इन वनस्पतियों की खेती उनके अनुकूल प्राकृतिक क्षेत्र में की जाए तो इनकी पैदावार में मात्रात्मक वृद्धि के साथ-साथ इनमें पाये जाने वाले सक्रिय तत्वों की प्राप्ति भी अधिकतम मात्रा में की जा सकती है। यदि कृषक अपनी-अपनी वातावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप उगने वाली जड़ी-बूटियों की खेती करेंगे तो अधिकतम लाभ अर्जित किया जा सकता है। सारणी में विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध वनौषधियों को दर्शाया गया है।

उत्तराखण्ड में कृषिकरण की संभावना वाली कुछ महत्वपूर्ण वनौषधियां:
1. समेवा: समेवा का कृषिकरण 4000 से 9000 फीट तक की ऊंचाई में नमीयुक्त मिट्टी में किया जा सकता है। पौंधे का रोपण जड़ तथा राइजोम के माध्यम से किया जाता है। इसकी जड़ों/ पौध को 30×30 सेमी. की दूरी में जुलाई अगस्त से रोपित किया जाता है। अधिक उपज के लिए जड़ों को दो वर्ष में खोदा जाता है। नवम्बर के माह में जब पौंधे की पत्तियां आदि सूखने लगे,
पौधों की जड़ों एवं राइजोम को खुरपी की सहायता से उखाड़ लेते हैं। जड़ों की मिट्टी हटाने के लिए बहते पानी में धोकर धूप में सुखाया जाता है। यदि फसल की खुदाई दो वर्षों में की जाती है तो 0.5 से 1.9 प्रतिशत तक सुगन्धित तेल प्राप्त होता है।
उपयोग: पंचाग का धार्मिक अनुष्ठानों में धूप-अगरबत्ती तथा हवन सामग्री बनाने में उपयोग किया जाता है। साथ ही यह खांसी, पीलिया, उदरशूल तथा दुर्बलता में भी उपयोगी है।

2. वन अजवायन: यह पौंधा 4000 से 10000 फीट तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। मार्च-अप्रैल माह में पौंधों को कतार से कतार में बोया जाता है। तत्पश्चात् पौध की दूरी 30×30 सेमी. रखी जाती है। कटिंग द्वारा भी बिजाई की जाती है। बुआई के पश्चात् पांच माह में पत्तियां एवं फूल आने पर ऊपर के 15 सेमी. के मुलायम तनों को काट लिया जाता है। पत्तियों को छाया में सुखाकर तुरन्त वायुरोधी डिब्बों में बन्द किया जाता है।
उपयोग: खाद्य पदार्थ, औषधि, सौंदर्य प्रसाधन एवं सुगन्ध।
3. कपूर कचरी: शीतोष्ण पर्वतीय क्षेत्र 5000 से 7000 फीट तक कपूर कचरी का पौंधा नम छायादार जंगलों में प्राकृतिक रूप से मिलता है। पुराने प्रकन्द अर्थात राइजोम को मार्च-अप्रैल माह में खेत में 60×60 सेमी. की दूरी पर रोपित किया जाता है। लगभग एक माह बाद कल्ले निकल जाते हैं। फसल 2-3 वर्ष के उपरान्त प्रकन्दों को खोदकर निकाल लेते हैं तथा हल्की छाया में सुखाकर संग्रहित करते हैं।
उपयोग: दवा, सुगंध उद्योग तथा सौन्दर्य प्रसाधनों में।

4. बच: यह पौंधा 6000 फीट तक नम भूमि में नदी नाले के किनारे एक गीली भूमि में पाया जाता है। बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है। बिजाई हेतु पौंधे के राइजोम का प्रयोग किया जाता है। इसके दो तीन टुकड़ों को 30×30 सेमी. के अन्तराल में खेत में लगभग 2 इंच नीचे लगाया जाता है। दो वर्ष बाद इसकी जड़ों को दिसम्बर-जनवरी माह में खोद लिया जाता है। साफ कर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर सुखाया जाता है।
उपयोग: पेट के रोग, जीवाणुरोधी, गले सम्बन्धित व लीवर रोग आदि।

5. सफेद मूसली: इस पौंधे के लिए 3500 फीट तक रेतीली दोमट जीवाश्म मृदा तथा गर्म तथा नमीयुक्त जलवायु उपयुक्त है। जल भराव इसके लिए घातक है। इसकी बिजाई राइजोम तथा अंगुली के आकार के जड़ों से की जाती है। जड़ों में ऊपर का भाग (क्राउन) अवश्य लगा रहना चाहिए। मानसून के प्रारम्भ में जून-जुलाई में ऊंची क्यारियों में 30×30 सेमी. की दूरी पर इसकी बिजाई की जाती है। माह नवम्बर-दिसम्बर में जब कंद सफेद से भूरे हो जायंे तो कुदाल की सहायता से खोद लेना चाहिए। कंदों को बहते पानी में धोकर धूप में सुखाकर नमी रहित भण्डारण करते हैं।
उपयोग: दवा (टाॅनिक), बलवर्द्धक।

6. सतावर: सतावर सम-शीतोष्ण क्षेत्रों में उगाया जा सकता है पर्वतीय क्षेत्रों, मध्यम पहाड़ियों एवं तराई के ऊंचे क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त हैं। सतावर की खेती बीज व कन्द के द्वारा की जाती है। जून-जुलाई में नर्सरी डालकर बीज बोना चाहिए। अगस्त माह में पौंध तैयार हो जाती है। जिसे खेत में 60×60 सेमी. पर रोपित कर दिया जाता है। रोपण के 16-18 माह पश्चात् जब पौंधा पीला होने लगे तब इनकी जड़ों की खुदाई कर धोने के पश्चात् चीरा लगाकर ऊपरी छिलका उतार लेना चाहिए तथा 2 दिन में धूप में सुखाकर भण्डारित करना चाहिए।
उपयोग: बलबर्द्धक, लकवा, मूत्र सम्बन्धी रोगों व गठिया में।

7. सर्पगन्धा: निचली पहाड़ियों एवं तराई के ऊंचे क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त हैं। सर्पगन्धा की बुआई सीधे बीज, जड़ व तने की कलम लगाकर की जा सकती है। यह 18 माह की अवधि की फसल है। बीज से पौंध तैयार करने हेतु नर्सरी में 3×1.5 मीटर की क्यारियां बनाकर अप्रैल-मई माह में 8-10 सेमी. की दूरी पर लाइनों में बोना चाहिए। रेत एवं खाद के मिश्रण से ढक देने से 15-20 दिन में अंकुर प्रारम्भ हो जाता है। जुलाई में पौंधारोपण 30×30 सेमी. की दूरी पर कर देना चाहिए। जब पौंधे की पत्तियां झड़ जाये तो भूमि गीली कर जड़ें खोद लनी चाहिए। जड़ों की छाल को जड़ से अलग नहीं करना चाहिए। जड़ों को हल्की छाया में सुखाकर नमी रहित शीतल स्थान पर बोरों में भंडारित करें।
उपयोग: उच्च रक्तचाप, अनिद्रा रोग, उन्माद, हिस्टीरिया आदि में उपयोग।

8. पिप्पली: गर्म एवं आर्द्र जलवायु उत्तम है, तराई क्षेत्र फसल के लिए उत्तम है। पर्वतीय क्षेत्रों में 3000 फीट तक उगाई जा सकती है। पिप्पली की खेती बीज अथवा कटिंग लगाकर की जा सकती है। कटिंग को मार्च-अप्रैल में पाॅलीथीन की थैली में लगाया जाता है। मई तक जड़ तथा पत्तियां आ जाती है। इस प्रकार तैयार किये गये पौंधों को खेत में 60×60 सेमी. की दूरी पर गड्डे बनाकर रोपित किया जाता है। एक गड्डे में दो पौंधे लगाना चाहिए। पिप्पली की लतायें 3 वर्ष तक उसी खेत में रहती हैं। रोपण के 6 माह बाद पुष्पगुच्छक आने लगते हैं। जब फल काले हो जायें तो उन्हें तोड़कर 4-5 दिन धूप में सुखाना चाहिए। फल वर्ष में 3-4 बार तोड़े जाते हैं। तीसरे वर्ष फल तोड़ने के बाद इसकी जड़ों एवं तने को भी उखाड़ कर बेचा जाता है।

उपयोग: यह मसाले में, खांसी आदि रोगों में उपयोगी है।

9. अश्वगन्धा: इसकी खेती के लिए बलुई एवं बलुई दोमट मिट्टी जिसमें जल भराव न हो एवं सूखे एवं कम वर्षा वाले गर्म क्षेत्र उपयुक्त हैं। अश्वगन्धा की बिजाई साधे बीज अथवा पौंध तैयार करके की जा सकती है। जुलाई माह बिजाई के लिए उपयुक्त है। नर्सरी हेतु 5 किलो बीज एक हेक्टेअर के लिए उपयुक्त है। लगभग 6 सप्ताह बाद पौंध को खेत में 60×60 सेमी. की दूरी पर रोपित करना चाहिए। बोआई के 150 से 170 दिन में फसल कटने योग्य हो जाती है। पूरे पौंध को उखाड़ कर जड़ को काट कर अलग कर लिया जाता है। उत्तम गुणवत्ता के लिए जड़ 7 सेमी. लम्बी एवं अन्दर से सफेद होनी चाहिए।
उपयोग: जड़ें टाॅनिक के रूप में, गठिया वात, खांसी में उपयोगी।

10. गिलोय: मैदानी गर्म क्षेत्र तथा निचले पर्वतीय क्षेत्रों में गिलोय की फसल बेल के रूप में सहारा लेकर चढ़ती है। जून-जुलाई माह में इसकी कलम लगाकर सिंचाई करते रहना चाहिए। लता तेज गति से बढ़ती है तथा फरवरी-मार्च में जब पत्तियां झड़ने लगे तो बेल को नीचे से एक फुट छोड़कर काट लेते हैं। कटे हुए तने से पुनः अंकुरण हो जाता है। तनों को छोटे टुकड़ों में काटकर छाया में सुखाकर बाजार में बेचा जाता है।
उपयोग: डायबिटीज, रोग प्रतिरोधकता बढ़ाने तथा ज्वर आदि में लाभदायक।

11. ऐलोवेरा (घृतकुमारी): घृतकुमारी की फसल जल भराव युक्त स्थान को छोड़कर प्रत्येक मृदा में हो सकती है। अधिक सर्दी व पाला इसके लिए उपयुक्त नहीं है। पर्वतीय क्षेत्रों में 4000 फीट तक एवं तराई के ऊंचे खेत इस फसल के लिए उपयुक्त हैं। घृतकुमारी का रोपण सकर्स द्वारा किया जाता है। भूमि को तैयार कर 60×60 सेमी. की दूरी पर सकर्स लगाया जाता है। यह कार्य फरवरी-मार्च माह में किया जाता है। रोपण के 8 माह पश्चात् पौधें से तैयार पत्तियों को काट लिया जाता है। यह फसल 3-4 वर्ष तक उसी भूमि से ली जा सकती है।
उपयोग: पेट सम्बन्धी विकारों में, त्वचा के रोगों में, रोग प्रतिरोधक तथा सौन्दर्य प्रसाधनों में।

12. चिरायता: 6000 फीट से 9000 फीट तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बहुतायत में होता है। फसल लगभग एक वर्षीय है। मार्च-अप्रैल माह में इसकी बिजाई सीधे अथवा नर्सरी लगाकर की जा सकती है। नर्सरी हेतु 200-300 ग्राम बीज/हेक्टेअर के लिए प्रर्याप्त होता है। पौंधों को 30×30 सेमी. की दूरी पर रोपित करना चाहिए। जनवरी-फरवरी माह में सम्पूर्ण फसल को उखाड़ लिया जाता है तथा छाया में सुखाकर भण्डारित करते हैं।
उपयोग: सम्पूर्ण पौंधे का क्वाथ दीर्घकालीन मंद ज्वर, अस्थिगत जीर्ण ज्वर, पुनरावर्तन ज्वर तथा लीवर की बीमारियों में प्रयोग किया जाता है।

13. बड़ी ईलायची: 6000 फीट तक नम स्थानों में मटियार/दोमट मिट्टी में इसकी कृषि की जाती है। इसका प्रत्यारोपण फरवरी-मार्च में किया जाता है। इसके साथ ही वर्ष में दो बार प्रथम पुष्प आने से पूर्व तथा दूसरे बार फल तोड़ने के बाद निराई-गुड़ाई की जानी चाहिए।
उपयोग: मसाले, यकृत, दन्त शूल आदि विकारों में इसका प्रयोग किया जाता है।

14. रीठा: सामाजिक वानिकी के लिए एक बहुपयोगी वृक्ष है। फलों की छाल को उबाल कर ऊनी कपड़ों की धुलाई तथा बालों को शैम्पू के रूप में धोने के काम में लाया जाता है। इसे डिटरजेंट के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जो एक अच्छी आमदनी का स्रोत हो सकता हैै। सर्वप्रथम बीज द्वारा नर्सरी तैयार कर ली जाती है, तदुपरान्त वर्षा ऋतु में इसे बंजर भूमि में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। पौंधा रोपण के 5 वर्ष बाद फल देना प्रारम्भ करता है। तदुपरान्त 60 से 70 वर्ष तक फल देता है।
उपयोग: फल, ऊनी कपड़ों की धुलाई, हर्बल शैम्पू में प्रयुक्त किये जाते हैं।

15. तेजपात: 6000 फीट तक की ऊंचाई में सुगन्धित पत्तों एवं छाल वाला वृक्ष होता है। फसल का रोपण पौंध तैयार कर किया जाता है। बीज को छोटी 3×1.5 मी. की क्यारियों में रेत एवं गोबर की खाद मिलाकर बिखेर दिया जाता है। हल्की सिंचाई के पश्चात् क्यारियों को पुवाल से ढक देना चाहिए। नर्सरी में बिजाई मार्च-अप्रैल माह में कर देनी चाहिए। तत्पश्चात् पौंध को जुलाई- अगस्त में 50 सेमी. व्यास एवं 60 सेमी. गहरे गड्डे में 10 फीट की दूरी पर लगाना चाहिए। एक बार लगने के बाद यह 100 वर्षों तक रहता है। 6 वर्ष बाद पत्तियों को संकलित करके छाया में सुखा लिया जाता है। 10-25 वर्ष के पेड़ से छाल भी संकलित की जाती है जिसे दालचीनी कहते हैं। उपज 01 हेक्टेअर में 100 कुन्तल सूखी पत्तियां।
उपयोग: दवा, मसाला, सुगन्धित तेल आदि में।

16. आंवला: यह वृक्ष 5000 फीट तक की ऊंचाई तक पाया जाता है। यह कृषि योग्य अथवा अनुपयोगी दोनों प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है। पौंधे का प्रवर्धन बीज द्वारा नर्सरी तैयार कर अथवा कलम लगाकर किया जाता है। तैयार पौंध को वर्षा ऋतु में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। आंवले का वृक्ष चार वर्ष से फल देना आरम्भ करता है तथा 50 वर्ष तक फल देता है।
उपयोग: आंवले का फल अम्ल पित्त को कम करता है, कब्ज हटाता है, कफ दूर करता है तथा मूत्रशोधक है।

कृषकों को वनौषधियों के कृषिकरण हेतु वित्तीय व्यवस्था करवाने वाली संस्थाऐं
1. राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, नई दिल्ली
2. राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड
3. कोआपरेटिव बैंक, नाबार्ड, सहकारी व ग्रामीण बैंकों से ऋण

वनौषधियों हेतु तकनीकी जानकारी प्रदान करने वाली संस्थाऐं
1. जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान, गोपेश्वर, चमोली (उत्तराखण्ड) फोन: 01372-252572
2. सहायक निदेशक कार्यालय, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड, 188/1 बसंत बिहार, देहरादून (उत्तराखण्ड) फोन: 0135-2761922
3. सगन्ध पादप सेन्टर, जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान
सेलाकुई, देहरादून (उत्तराखण्ड), फोन: 0135-2698305
4. जिला भेषज संघ कार्यालय, जो प्रत्येक जिले में उपलब्ध है।

उत्पाद विक्रय बाजार व व्यवस्थागत सूचनाऐं: काश्तकार उत्तराखण्ड में निम्नलिखित संस्थाओं को अपना उत्पाद बेच सकता है।
1. जनपदीय सहकारी भेषज क्रय-विक्रय संघ जो प्रत्येक जनपद में है।
2. जनपदीय कोआपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन, 125 ओल्ड नेहरू काॅलोनी, हरिद्वार रोड, देहरादून
3. उत्तराखण्ड वन विकास निगम
4. औषधि क्रेता व मण्डी
1. टनकपुर (चम्पावत) 2. रामनगर (नैनीताल) 3. हरिद्वार 4. देहरादून 5. टिहरी (़ऋषिकेश)

औषधीय एवं सगन्ध पौंधों के कृषिकरण हेतु कृषक पंजीकरण प्रक्रिया:
1. पंजीकरण का उद्देश्य कृषकों को राज्य एवं केन्द्र सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली अनुदान सुविधा से परिचित करवाना, तकनीकी जानकारी सुलभ कराना, प्रशिक्षण सुविधा प्रदान करना, प्रसंस्करण व्यवस्था का लाभ देना तथा उत्पादित जड़ी-बूटी की की निकासी को सुगम बनाना है।
2. जो कृषक जड़ी-बूटी का कृषिकरण करना चाहते हैं वे अपने नजदीकी जनपदीय भेषज संघ संस्था से या जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान, गोपेश्वर से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
3. पंजीकरण उन्हीं कृषकों का किया जाता है जिनके नाम
विधिवत भूमि उपलब्ध है।
4. पंजीकरण कार्य चार वर्षों के लिए किया जाता है, तत्पश्चात् पंजीकरण का नवीनीकरण किया जा सकता है।
5. कृषिकरण द्वारा उत्पादित जड़ी-बूटी की निकासी जड़ी-बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर द्वारा की जाती है जो कि संस्थान द्वारा पंजीकृत कृषक होते हैं।
6. निकासी रवन्ना जड़ी-बूटी शोध संस्थान द्वारा पंजीकृत काश्तकार की मांग पर अग्रिम जारी किया जाता है। फसल की कटाई के अनुमानित समय से तीन माह के लिए फसल की निकासी दी जाती है।
7. वन विभाग की प्रथम चेकिंग चैकी में जड़ी-बूटी उत्पाद की निकासी के समय निकासी पत्र में काश्तकार द्वारा उल्लिखित मात्रा के सापेक्ष ले जाने वाले उत्पाद का आकलन कर दिया जाता है।

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