गुमानी और कुमाऊँ की कविता परंपरा

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gumani pant poems
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पिथौरागढ़ जिले की कुमाऊंनी काव्य परम्परा की शुरुआत, कुमाऊंनी के पहले कवि लोकरत्न पंत ‘गुमानी’ से मानी जाती है। गुमानी जी का जन्म सन् 1791 को माना जाता है। कुमाऊंनी के अलावा गुमानी जी ने संस्कृत, नेपाली व हिन्दी में लिखा है। गुमानी जी की कविताओं में उस समय की राजनीतिक, सामाजिक दशाओं का वर्णन हैं। अपने गांव उप्राड़ा, गंगोलीहाट पर एक कुमाऊंनी कविता में, उनका जन्म स्थान प्रेम दिखाई देता है।

‘‘उत्तर दिशि में वन उपवन छन हिसालू काफल किल्मोड़ा,
दक्षिण में छन गाड़-गधेरा बैदी बगाड़ नाम पडा़
पूरब में छौ ब्रह्म मंडली पश्चिम हाट बाजार बड़ा,
तैका तलि बटि काली मंदिर जबदम्बा को नाम बड़ा,
धन्वंतरि का सेवक सब छन भेषज कर्म प्रचार बड़ा
धन्य धन्य यो ग्राम बडौ छौ थातिन में उत्तम उप्राड़ा।’’
हिसालू पर गुमानी जी की कविता हैं-
‘हिसालू की बाण बडी रिसालू
जां जां जांइे उधेड़ि खांछेे
ये बात को कोई गटो नि मान
दुध्यालु की लात सौनी पडंछै।’

दाड़ियाखोला, सोर पिथौरागढ़ में 1880 में पैदा हुए बाबू चंद्र सिंह तडागी, मिडिल स्कूल खेतीखान में हेडमास्टर थे। 1909 में (संवत् 1996) मुरादाबाद से छपा ‘चन्द्र शैली’ नामक काव्य संग्रह उनका प्रकाशित हुआ था। ‘दुंदबोलि’ सम्पादक श्री मथुरादत्त मठपाल जी ने पूना फोटो कापी मगाकर दुदबोलि-2011 वार्षिकी में उसे छपाया है।
‘विद्या-भाग्य-उद्यम’ कविता है-

विद्या क्या छ बिधाता है बिधाता लै ठूली
ईश्वर का द्वार जानी इलमै लै खुली
इलम की चश्में ले अकलै को बाटो
ईश्वर को घर लग देख माठू-माठो।
इलमै का चश्मा में बडी़ छ रोशनी
गुन अवगुन नाना ढोलों झा देखिनी
दुनियां में कसा छन भौत रोजगार
पेट भरु लिलान को निछ आरोपार
पेट सबै भरि जानी जनम लीबेर
नाज सबै उडै़ जानी आघा आधा सेर।’

मिहनत कविता के अंश है।-
‘‘मिहनत करि लिय न डर वी देखी,
मिहनत बदा दिछें दुनियां की सेखी
मिहनत जो करनी दुनिया भीतेर,
पांसा कसी मार लिनी दश पांच तेर।
लक्षमि लै दाखी हुछ शरमी मैंस की,
छनाछन करि लिय चांदी का पैंसा की।’’

नन्द कुमार उप्रेती जी का जन्म सन 1930 में उप्रेती खोला पांखू, पिथौरागढ़ में हुआ। घर से भाग कर लखनऊ चले गये। हिन्दी, बांग्ला, संस्कृत, कुमाऊंनी का उच्च कोटि का भाषा ज्ञान था आपको। लखनऊ के विद्यान्त कालेज में अध्यापन किया। मृत्यु फरवरी 2005 में हुई।

’रुड़ कविता के अंश हैं-
‘रुड़ ऐगे, धरती ताती, घामलि फाटी जांछि चानी
आम् कूणैछि पार छोबे, लौ धैं झट्ट टौण पाणी
गाड़ गध्यारा सुकण पैठा, गोरु बाछा स्यौव लुकण पैठा
यकबटी यकबट ग्वाव बणन उड्यार भतर बैठन पैठा
इज कुणैछि, मुना लागी गे, कसिक करुॅं बुति धाणी
घामलि फाटि जांछि चानी।’’

‘अघिन कै हिट’ कविता है-
‘तू आब न लुक उढ्यार पन,
बाट छैं कत्तू जानै कन्
भ्योव छन भकार छन्,
थामि न सकन् त्यार खुटन्
डर न तू देखि ल्वेक् छिट,
अघिनकै हिट् अघिनकै हिट्
बागले कोड़बागले,
बाट पन बुकाल त्वे
श्याप-किड़ चटकाल् त्वे,
बाट बटि भबर्याल त्वे
छाडिये जन आपणि तु जिद अघिन कै हिट्।’
बहादुर बोरा श्रीबन्धु, कुमाऊंनी के महत्वपूर्ण कथाकार, कवि हुए हैं। उनका जन्म 21 जुलाई, 1939 को गढ़तिर, बेरीनाग पिथौरागढ़ में हुआ तथा निधन 13 जून, 2008 को हुआ। स्वास्थ्य विभाग में सेवा के दौरान आप अल्मोडा़, नैनीताल आदि जगहों पर रहे। कुमाऊंनी भाषा में ‘मन्याङर’ उनका कहानी संग्रह हैं ‘अदम बाट में उताॅंण है गई’ कविता के अंश हैं-
‘जनलि कौछि ठाड़ हवौ,
अघिल बडौ़, हमा्र दगा्ड़ आ्वौ बाड़ फ्वडा
जा्णि कि भौछ हिटन हिटनै ऊ,
अदम बाट में उता्ॅण है गई।
जो कभै स्यू जा्स बकुरछि,
और गुराग जास् गगुरछि
द्वि चुपा्ड़ गासक उपर वीं,
पुछड़ हलकै कुकुर जस कुकाॅंण फै गई।’

महेन्द्र मटियानी जी का जन्म 05 दिसम्बर, 1943 को हुआ। उनकी शिक्षा पिथौरागढ़ के मिशन इण्टर कालेज से हुई। कुछ वर्ष नेवी में सेवा के उपरान्त साहित्य सेवा व पत्रकारिता की। ‘जनजागर’ अखबार निकाला। कुमाऊंनी काव्य संग्रह ‘हिया रे उदास किलै’ छपा है।
‘मन्ख्यक मन’ कविता के अंश हैं-
‘उच्च, जाणि हिमाल, गैल, जाणि पताल
धरती हैं विशाल, मन्ख्यक् मन।
जो जितौ, मनैलि, जो हारौ, मन हुॅं
कभै एक लगन हुॅं, मन्ख्यक मन।’

कुमाऊंनी गजलें भी मटियानी जी ने लिखीं।
‘यस किलै हूॅं, कभै, यसि नराई लागैं,
बस आफुणिं भौत, कम-कम पराई लागैं
एक हिमालय कपोरि बेरि आॅंचुइ भरि तुड़ुक
सारि उमर, सारि जनमैकि कमाई लागैं
रोज गीताक् पुरोहित लगन करि थाकीं
पीर फिर-फिरि य’ मेरी अणबेवाईं लागै।
यसि चेपा-चेप में पड़ि गयाॅ हम सबै
याॅ आफुणि हुणि आफी कैं पराई लागै।

एम॰डी॰ अण्डोला जी, कुमाऊंनी के महत्वपूर्ण कवि हुये हैं। इनका जन्म 2 जनवरी, 1952, जमतोला, गणाई गंगोली, पिथौरागढ़ में हुआ। महात्मा गांधी इण्टर काॅलेज, पनुवानौला में इन्होंने अध्यापन किया। इनका निधन 03 मई 2012 को हुआ। कुमाऊंनी में इनकी तीन कविता संग्रह कचुवैन, धर्तिक काखिन और धुपैण
छपे हैं।

‘घण्टी’ कविता के अंश इस प्रकार हैं-
‘ग्वावा ……………… ऽ ग्वावा
आज त्यार पाव
त्वील जाॅणि कसि सिट्टि बजै?
म्यार गौं-गिरदामाक्/भ्याड़-बकारोंलि
रातों-रात रङ बदलि दे।
ठुल-ठुल लाख् ब्याकों ठेनम
म्यर चन्नू हिल्वाण पिचीगो,
आॅखिर-रूपसि बाकरी गाव
घण्टी माव।’

परमानन्द चैबे जी का जन्म 1945 में लोहाघाट के निकट बिसंुग क्षेत्र में हुआ। आप हिन्दी, संस्कृत, कुमांऊनी भाषा के विद्वान हैं। कुमांऊनी में आपका काव्य संग्रह छपा है। आप पिथौरागढ़ महाविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर रहे। सेवानिवृत्ति के बाद भी साहित्य सेवा में तत्पर हैं।
‘उन दिन, उन भला दिन’ कविता है-
उन दिन, उन भला दिन
कब तक आला,
सबै जन पैरि लैला
घुघुतिया माला?
उन दिन, उन भला दिन
कब आला,
सब जन हंसि-खुशि
मन्दिर में जाला
पंच नाज सबन का
घर कब आलो
कब होलो
सब घर खुशी को उज्यालो।

दिवा भट्ट जी अल्मोड़ा काॅलेज में हिंदी का प्रोफेसर रहीं।
हिंदी व कुमांऊनी में आपने आलेख, निबंध व कवितायें लिखी हैं। आप पिथौरागढ़ के निकट विषाड़ गांव की रहने वाली हैं। ‘पहरू’, ‘कुमगढ़’ आदि पत्रिकाओं में आपकी रचनायंे छपती रहती हैं।
बसन्त गीत-
‘ह्वे सुण वे सखी
आज ऐरौ छ बसन्त
चा छैं, चा छैं वे सखी
काँ-काँ ऐरौ छ बसन्त
किल्मोड़ी में फूल आया, हिसालू में त्वापा
तितली-पुतली दगै नाच्नी मन्स्वापा
भिटालू, प्योली, बुरूँसी भैरौ छ बसन्त’

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