तंत्र की उपेक्षा से आहत कुमाऊँ के इकलौते पांडव गाथा गायक

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कुमाऊं के एकमात्र पांडव गाथा गायक दान सिंह भंडारी, तंत्र की उपेक्षा से आहत हैं। 72 वर्ष की उम्र में भी वह कूत के जागर (ग्राम सभा का सामूहिक जागर) में पूरे जोश के साथ लयबद्ध होकर गाते हैं। उन्होंने अपनी गायकी का जलवा वर्ष 1994 में कृषि विज्ञान केंद्र दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में भी बिखेरा। टीवी सीरियल महाभारत के निर्माता निर्देशक रामानंद सागर ने भी दान सिंह से पांडव गाथा ली थी।
आठगांव सीलिंग क्षेत्र में ड्योडार ग्रामसभा के नाखेत निवासी दान सिंह ने अपने पिता मोती सिंह भंडारी से कांसे की थाली के साथ पांडव गाथा गायन सीखा। उनकी गायन शैली से प्रभावित होकर क्षेत्र के देवेंद्र भट्ट कृषि विज्ञान केंद्र दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में उन्हें लेकर गए। उन्होंने पांडव गाथा गायन से वहां काफी वाहवाही लूटी थी। दान सिंह ने पांडव गाथा गायन की शैली को अपने तक ही सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपने बेटों पूरन सिंह व शमशेर सिंह भंडारी को भी यह पौराणिक लोक संस्कृति की विधा सिखाई। अब उनके दोनों बेटे सोरघाटी के साथ ही गंगोलीहाट व खटीमा में भी पांडव गाथा बखान को जाते हैं। दान सिंह बताते हैं कि इसमें पांडवों के पैदा होने से लेकर अंत तक की गाथा को गाया जाता है। कुंती, माद्री, पांडु, द्रोपदी स्वयंवर, भीष्म पितामह, महाभारत युद्ध का गायन के विभिन्न उतार-चढ़ावों के साथ बखान किया जाता है।
पौष माह में ड्योडार के ग्रामीण थलकेदार मंदिर में सामूहिक रूप से जागर लगाते हैं। इसमें दान सिंह व उनके बेटे 11 दिन तक रात-दिन पूरे जोशो-खरोश के साथ गायन करते हैं। व्यक्तिगत रूप से ग्रामीण एक या दो दिन के भी जागर लगाते हैं। दान सिंह का कहना है कि प्रदेश की सरकारों ने लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए। उनका कहना है कि पिछली राज्य सरकार ने लोक संस्कृति के जानकारों को पेंशन देने का वादा किया था। राजस्व निरीक्षक ने उनके घर पहुंचकर पेंशन के लिए फार्म भरा। बावजूद इसके आगे की कार्यवाही ठप हो गई। उनके बेटे पूरन सिंह भी कहते हैं कि उत्तराखंड की इस पौराणिक लोक संस्कृति को जिंदा रखने के लिए सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन की बेहत सख्त जरूरत है।

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