आठ मिनट चली ऐतिहासिक बग्वाल देखिये पूरा वीडियो ।

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चम्पावत -आठ मिनट चली ऐतिहासिक बग्वाल । एक मिनट फल और सात मिनट तक हुआ पत्थरों का युद्ध । बग्वाल में 334 लोग घायल हुए।154 लोगों का स्थानीय अस्पताल जबकि 180 लोगों का मंदिर के पास बने केम्प में उपचार किया गया।
देवीधुरा की बग्वाल यहां के लोगों की धार्मिक मान्यता का पवित्र रूप होने के साथ ही सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन करने की विषय वस्तु भी है। एक वृद्धा के पौत्र का जीवन बचाने के लिए यहां की चारों खामों की विभिन्न जातियों के लोग आपस में किस प्रकार खून बहाते हैं।

यह सामाजिक सद्भाव के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है। क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न जातियों में से चार प्रमुख खाम चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगड़िया खाम के लोग पूर्णिमा के दिन पूजा अर्चना कर एक दूसरे को बग्वाल का निमंत्रण देते हैं।

माना जाता है कि पहले यहां नरबलि देने की परंपरा थी, लेकिन जब चम्याल खाम की वृद्धा के एकमात्र पौत्र की बलि के लिए बारी आई तो वंशनाश के डर से उसने मां वाराही की तपस्या की। माता के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों के मुखियाओं ने आपस में युद्ध कर एक मानव बलि के बराबर रक्त बहाकर कर पूजा करने की बात स्वीकार कर ली। कहा जाता है कि तभी से ही बग्वाल का सिलसिला चला आ रहा है।

बग्वाल में भाग लेने के लिए रणबांकुरों को विशेष तैयारियां करनी होती हैं, जिसमें एक पखवाड़े पहले से ही खान-पान संबंधी स्वच्छता बरतनी पड़ती है। बग्वाल स्वच्छ कपड़े पहनकर लाठी और रिंगाल की बनी ढाल के फर्रे से खेली जाती है। सुरक्षा के लिए मैदान में फर्रो और लाठियों को सटाकर कवच बनाया जाता है। स्वयं को बचाकर दूसरे दल के फेंके गए पत्थर या फल और फूल को दोबारा से दूसरी तरफ फेंकना ही बग्वाल कहलाता है।

अतीत से ही आषाढ़ी कौतिक के नाम से मशहूर देवीधुरा की बग्वाल को देखने हर साल देश-विदेश के हजारों पर्यटक और श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचते हैं। मेला अवधि में क्षेत्र की लोक कलाओं के प्रदर्शन के अलावा धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी चरम पर होता है।

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