बढ़ता पलायन वीरान बाखलियां

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कुमाऊँ पोस्ट   – उत्तराखंड हिमालय के ग्रामीण जनजीवन में पलायन की होड़ दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। लोग गांव में अपना तीन मंजिला मकान और खेत खलिहान छोड़कर शहरों में निवास करने लगे हैं। जिला  पिथौरागढ़ में जहां सन् 1990 के आसपास मात्र कुछ हजार जनसंख्या थी वहीं आज करीब डेढ़ लाख लोग निवास करने लगे हैं और अनेक गांव पलायन से वीरान हो गये हैं। यही हाल कुमाऊं व गढ़वाल के अन्य गांवों का भी है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के 17793 गांवों में से 1053 गांव पूरी तरह से वीरान हा चुके हंै। अन्य 405 गांवों में लगभग 10 से कम लोग निवास कर रहे हैं। 2013 में आयी भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद से गांवों से पलायन का रेट बढ़ गया है। अब यहां 3500 गांवों के वीरान होने की सूचना है। जनपद पौड़ी का एक गांव सानियार जो जिला मुख्यालय से महज 6 किमी. की दूरी पर है पूरी तरह वीरान हो चुका है। चंपावत जनपद के अमोड़ी में भी ऐसा ही एक गांव है जो पूरी तरह भूतहा हो चुका है। गांवों से पलायन 1980 से ही शुरू हो गया था जो अब चरम पर पहुंच गया है। वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य गठन हुआ तब से इस विषय पर अभी तक कोई कारगर नीति नहीं बनी है। 13 जनपदों में तीन तराई के मैदानी जिले हैं। यहां की विकास दर अन्य पहाड़ी जिलों से कहीं ज्यादा है। पहाड़ी जिलों में प्रति व्यक्ति आय मैदानी जिलों की तुलना में कम है। अर्थ एवं संख्या विभाग के आंकड़ें बताते हैं कि मात्र तीन मैदानी जिलों में ही प्रति व्यक्ति आमदनी बढ़ी है। शेष 10 पहाड़ी जिले इन तीन मैदानी जिलों को सस्ते मजदूर उपलब्ध कराने का काम करते हैं। राज्य गठन के बाद विकास की सही नीति नहीं बन पायी है। संतुलित विकास की बात नहीं हुई। यह बात विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल भी स्वीकार करते हैं। ग्रामीण जन स्वास्थ्य की बदहाली, सेवाओं का अभाव, विद्यालय, अस्पताल, रास्ते, सड़कें, पेयजल, कानून व्यवस्था इत्यादि अनेक ज्वलंत मुद्दे हैं जिनका हल न होने के कारण पलायन ही एकमात्र उपाय दिखता है। ग्रामीण संस्कृति का आधार समूह जीवन लगभग समाप्त हो सा हो गया है। आपसी सहयोग, सौहार्द्र लगातार कम होता जा रहा है। पलायन का यह भी बड़ा कारण है। खाली हो चुके गांवों में अब जंगली जानवर, लेंटोना घास की झाड़ी और बंजर हो चुके उपजाऊ खेत ही देखने को मिलते हैं। भू आध्याप्ति की नजर से देखें तो गांवों की छोटी जोत और बिखरी हुई जोत भूमि स्वामित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है। 0.68 हेक्टेयर औसत भूमि स्वामित्व बहुत कम है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली कृषि अब लुप्तप्रायः हो चुकी है। कभी यह 60 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण रोजगार देती थी। अब लोग खेती के लिए नेपाली मजदूरों को भूमि सौंपने लगे है। सशस्त्र सुरक्षा बल के आंकड़ों के अनुसार 128 नेपाली परिवार दोहरी नागरिकता लेकर पहाड़ी किसान बन चुके हैं। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2001 में 769944 हेक्टेयर कृषि भूमि में से खेती घटकर 2014-15 में मात्र 701030 हेक्टेयर में सिमट गयी है। अब अधिकांश गांवों में कृषि की जगह मनरेगा से लोग रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। खेती छोड़ चुके एक किसान के अनुसार वर्ष में 50 दिन काम करके 7500 रूपये कमा लेता हूं। खाद्य सुरक्षा योजना के अनुसार एक से तीन रूपये की कीमत पर राशन मिल जाता है तो खेती में हाड़तोड़ मेहनत क्यों करूं। जंगली जानवरों और इंसान का संघर्ष भी खेती छोड़ने का एक कारण है। अब तो गुलदारों का आतंक भी लोगों को गांव छोड़ने के लिए प्रेरित करता है। पेड़ों की कटाई, घास की पर्त कम होने तथा नदियों का जल स्तर घटने के कारण भूस्खलन, बाढ़, प्राकृतिक आपदा तथा पेयजल किल्लत भी पलायन का कारण बना हुआ है। लेकिन आश्चर्य तब होता है जब उत्तराखंड में वीरान हो चुके इन गांवों में विश्व बैंक पोषित अनेकों बड़ी-बड़ी विकास परियोजनाएंे चल रही हैं। इनमें जलागम विकास, आजीविका संवर्धन, जल-जंगल, जमीन के संरक्षण हेतु पर्यावरणीय विकास योजनाऐं जैसे बकरलिप, होली कैलाश, बीएडीपी, जापान फंड (जायका) तथा कृषि विकास, उद्यानीकरण, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, डिजास्टर रिस्पांस जैसी अनेकों बड़ी-बड़ी परियोजनायें चल रही हैं। इन योजनाओं की धनराशि किसके खाते में जा रही है? इन योजनाओं का रिजल्ट क्या है। इनका प्रभाव क्या है और इनके होने न होने से किसको असर पड़ने वाला है। इस पर हमारे नेताओं का बिल्कुल ध्यान प्रत्येक योजना नेताओं की राजनीति चमकाने में एक निश्चित हिस्सा उन्हें दे देती हैं शेष संबंधित विभाग के निदेशक, सचिव व अन्य छोटे बड़े अधिकारियों का चरागाह बना दिया जाता है। यदि कोई जांच या सवाल उठाता है तो जमीनी स्तर में छोटे कर्मचारियों तथा ग्राम पंचायत के

प्रतिनिधियों को दोषी ठहरा दिया जाता है। विकास के नाम पर राजनीति और खाने कमाने के इस खेल का पलायन जैसे मुद्दों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है।

किसी भी समाज में बेहतर सुविधाओं के लिए दूसरे स्थान पर जाना एक स्वाभाविक और एच्छिक प्रक्रिया है। हर समाज में से कुछ लोग उसे छोड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। लेकिन उनके वापस अपने समाज में लौटने की संभावना बनी रहती है। इस प्रक्रिया को लम्बवत गतिशीलता कहा जाता है, इससे व्यक्ति और समाज दोनों का ही भला होता है। इसके ठीक विपरीत पलायन वह प्रक्रिया है जब कोई व्यक्ति या समूह प्राकृतिक या मानवीय दबावों के कारण अनैच्छिक रूप से एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान को चला जाता है। उत्तराखंड के समाज में पलायन एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में समाने आ चुका है। एक करोड़ की आबादी वाले इस राज्य में पर्वतीय क्षेत्र में 60 लाख की आबादी है और लगभग 30 लाख से ज्यादा उत्तराखंडी देश और विदेश के कई स्थानों पर निवास करते हैं। संभवतः देश में पलायन करने वाले क्षेत्रों में यह सबसे आगे है। इस पलायन के लिए सरकारों की गलत नीतियां के साथ ही पर्वतीय क्षेत्र की कठिन भौगोलिक स्थिति जिम्मेदार है। इन नीतियों ने लोगों का पहाड़ में रहना कठिन बना दिया था।

रोजगार के लिए देश और विदेश जाने की उत्तराखंडियों की पुरानी परंपरा रही है। आजादी से पहले कुमाऊं के लोग कोलकाता और बमा किसी भी समाज में बेहतर सुविधाओं के लिए दूसरे स्थान पर जाना एक स्वाभाविक और एच्छिक प्रक्रिया है। हर समाज में से कुछ लोग उसे छोड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। लेकिन उनके वापस अपने समाज में लौटने की संभावना बनी रहती है। इस प्रक्रिया को लम्बवत गतिशीलता कहा जाता है, इससे व्यक्ति और समाज दोनों का ही भला होता है। इसके ठीक विपरीत पलायन वह प्रक्रिया है जब कोई व्यक्ति या समूह प्राकृतिक या मानवीय दबावों के कारण अनैच्छिक रूप से एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान को चला जाता है। उत्तराखंड के समाज में पलायन एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में समाने आ चुका है। एक करोड़ की आबादी वाले इस राज्य में पर्वतीय क्षेत्र में 60 लाख की आबादी है और लगभग 30 लाख से ज्यादा उत्तराखंडी देश और विदेश के कई स्थानों पर निवास करते हैं। संभवतः देश में पलायन करने वाले क्षेत्रों में यह सबसे आगे है। इस पलायन के लिए सरकारों की गलत नीतियां के साथ ही पर्वतीय क्षेत्र की कठिन भौगोलिक स्थिति जिम्मेदार है। इन नीतियों ने लोगों का पहाड़ में रहना कठिन बना दिया था।

रोजगार के लिए देश और विदेश जाने की उत्तराखंडियों की पुरानी परंपरा रही है। आजादी से पहले कुमाऊं के लोग कोलकाता और बमा तक रोजगार के लिए जाया करते थे, जबकि गढ़वाली रोजगार के लिए मेरठ, दिल्ली और पंजाब जाया करते थे, लेकिन यह जाना अस्थायी था और इन लोगों का परिवार अपने गांव में रहकर ही आजीविका कमाता था। इस स्थिति में परिवर्तन आजादी के साथ ही शुरू हो गया। तब नयी शासन व्यवस्था ने नये रोजगार के अवसर पैदा किये और इसने पर्वतीय क्षेत्र के युवाओं को मैदान की ओर आकर्षित किया। इसका एक कारण शिक्षा भी रहा। मैदान की ओर जाने वालों में सबसे पहले वे लोग थे, जो शिक्षा प्राप्त कर चुके थे और उनके सामने नये रोजगार के द्वार खुले हुए थे। बाद में वे अपने साथ कम शिक्षा पाए लोगों को भी अपने साथ ले गए, जिनकी पहली पीढ़ी घरेलू नौकर, चैकीदार या होटलों में काम करने वाले नौकर के तौर पर रही।

1980 तक रोजगार के लिए उत्तराखंडियों का अपने गांव और शहरों से नाता नहीं टूटा था लेकिन अब वह पीढ़ी सेवानिवृत होने वाली थी और वह शहरी क्षेत्र में रहने की अभ्यस्त हो चुकी थी और यह मानने लगी थी अब पहाड़ की कठिन जिंदगी जीना उनके लिए संभव नहंी है। इसलिए उसने पहाड़ लौटने के बजाय वहीं बस जाना उचित समझा। इसी समय देश में शहरीकरण भी बढ़ने लगा, इस प्रक्रिया ने इन लोगों को सुविधा दे दी कि वे शहरों मंे बसना शुरू कर दें। यह पर्वतीय लोगों में एक मनौवैज्ञानिक परिवर्तन की तरह था। अब तब लोग भले ही नौकरी बाहर

उत्तराखंड बनने के बाद अकेले पिथौरागढ़ जिले से लगभग 17 हजार परिवार पलायन कर चुके हैं। इनमें से

अधिकांश हल्द्वानी या तराई के इलाकों में बस गए हैं। हालत यह है कि आने वाले समय में इससे भी ज्यादा परिवार पलायन करने को तैयार हैं, क्योंकि उन सभी ने अपने लिए इन स्थानों में जमीन खरीद ली है।

करते हों लेकिन उनके परिवार गांव में ही रहते थे, लेकिन अब वे रोजगार के साथ ही अपने परिवारों को भी शहरों की ओर ले जाने लगे। यही से पर्वतीय इलाकों से पलायन की प्रक्रिया शुरू होती है। इस पलायन को बढ़ाने में शासन की नीतियां भी कम जिम्मेदार नहीं है। उत्तर प्रदेश में रहते हुए पर्वतीय क्षेत्र उपेक्षा के शिकार हुए। यहां की भौगोलिक स्थिति को देेखते हुए ऐसी योजनाएं कभी बन ही पहीं पायीं कि ये रोजगार के अवसर पैदा कर सकें या कृषि को लाभदायक बनाया जा सके।

पारिवारिक कृषि भूमि का लगातार बंटवारा होते रहने के कारण खेती की जमीन कम हो गयी। इससे खेती और भी ज्यादा अलाभप्रद हो गयी। सरकार के स्तर पर इसको ठीक करने की कोई कोशिश नहीं की गयी। इसके लिए चकबंदी या गांवों के पास की अतिरिक्त वन भूमि को ग्रामीणों को देकर इसे लाभप्रद बनाने की कोशिश की जा सकती थी लेकिन शासन के पास इन सब बातों को सोचने का कोई समय ही नहीं था। तब भी रोजगार का सबसे बड़ा साधन सेना ही बना हुआ था। उत्तर प्रदेश के पर्वतीय इलाकों के समानांतर हिमाचल ने राज्य बनने के बाद काफी प्रगति की। वहां की सरकार ने इस तरह से नीतियों को बनाया जिससे वहां के लोगों की आय में लगातार वृद्धि होती रही। जहां एक ओर हिमाचल के नेता स्थानीय स्तर पर अपने क्षेत्र से जुड़े रह कर कार्य कर रहे थे वहीं पर्वतीय क्षेत्र के नेताओं के लिए देश की राजनीति में स्थान बनाना प्रमुख तत्व रहा। यही कारण था कि कई राष्ट्रीय नेता देने के बाद भी यह क्षेत्र आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा ही रहा। अपनी उपेक्षा और बदहाल स्थिति के विरोध में आंदोलन करते रहे, जिनमें चिपको और नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन प्रमुख हैं। लेकिन ये आंदोलन किसी भी तरह से क्षेत्र की स्थिति को सुधारने में सफल नहीं हो सके। तब यह तथ्य लोगों के सामने आ गया कि बिना अलग राज्य बने इस क्षेत्र का भला होने वाला नहीं है। इसकी अंतिम परिणति उत्तराखंड राज्य आंदोलन के तौर पर हुयी। अलग राज्य की अवधारणा में पलायन से उपजी हताशा भी एक बड़ा कारण थी।

राज्य बनने के बाद यह सोचा गया कि अब सरकारें ऐसी नीतियां बनाएगी, जिससे इस इलाके में रोजगार के अवसर पैदा होंगे और पलायन रूक सकेगा लेकिन राज्य बनने के बाद ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। नीतियां भी कमोवेश वहीं चल रहीं है, जो उत्तर प्रदेश के दौर में हुआ करतीं थीं। आज भी पर्वतीय क्षेत्र उपेक्षा के शिकार हैं। अलग राज्य आंदोलन पर्वतीय क्षेत्रों के लिए स्वायत्ता की मांग को लेकर था लेकिन राज्य बनाने के साथ ही पर्वतीय क्षेत्र की उपेक्षा कर दी गयी। पर्वतीय और मैदानी क्षेत्र को बराबर करने के प्रयास में हरिद्वार को उत्तराखंड के साथ जोड़ दिया गया। इससे सारा जोर मैदानी क्षेत्रों की ओर चला गया। जब विशेष राज्य का दर्जा दिया गया तो उसका सारा लाभ चार मैदानी जिलों हरिद्वार, देहरादून, उधमसिंह नगर और नैनीताल को ही मिला है। पर्वतीय क्षेत्र में कोई भी उद्योग नहीं लग पाया है और न ही कोई ऐसी योजना बनायी गयी है, जिससे पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की आय में वृद्धि हो सके। स्थिति वैसी ही है जैसी उत्तर प्रदेश के दौर में थी और सही कहा जाए तो हालत उत्तर प्रदेश से बदतर हुयी है। उत्तराखंड मंे प्राकृतिक और बजट की खूब बंदरबांट हो रही है। उत्तराखंड बनने के बाद अकेले पिथौरागढ़ जिले से लगभग 17 हजार परिवार पलायन कर चुके हैं। इनमें से अधिकांश हल्द्वानी या तराई के इलाकों में बस गए हैं। हालत यह है कि आने वाले समय में इससे भी ज्यादा परिवार पलायन करने को तैयार हैं, क्योंकि उन सभी ने अपने लिए इन स्थानों में जमीन खरीद ली है।

इस पलायन के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार राज्य बनने के बाद सरकार की नीतियां हैं। राज्य बनने के 16 साल बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और अन्य मूलभूत सुविधाएं देने में सरकारें असफल हुयी है। पर्वतीय क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, अस्पतालों में डाॅक्टर नहीं है, सड़के बदहाल हैं। तब कोई आदमी यहां कैसे रहना पसंद करेगा। जिस किसी के पास थोड़ी सी भी संभावना होती है वह यहां से चले जाना पसंद करता है। गांवों में केवल वे लोग रह गये हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे मैदानों या अन्य स्थानों को जा सकें। लोगों का सबसे ज्यादा पलायन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के कारण हो रहा है।

राज्य बनने के बाद पलायन की प्रकृति बदल गयी है। पहले राज्य से बाहर पलायन ज्यादा हो रहा था लेकिन अब राज्य में आंतरिक पलायन हो रहा है। एक तो पहाड़ छोड़कर मैदानी जिलों की ओर पलायन की प्रकृति है दूसरी प्रकृति गांव से शहरों की ओर पलायन है। इसके तहत गांव से लोग जिला, तहसील या ब्लाक मुख्यालय की ओर पलायन कर रहे हैं। दोनों ही स्थितियों में गांव से लोग जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए गांव से शहर की ओर आए हैं क्योंकि गांव में जो स्कूल हैं या तो वहां शिक्षक नहीं है और अगर हैं भी तो वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में असमर्थ साबित हुए हैं। राज्य बनने के बाद ही प्रदेश के तीन हजार गांवों में ताले लटक चुके हैं और वे गैर आबाद की श्रेणी में जा चुके हैं।

पलायन से सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समस्याएं तो पैदा हो ही रही हैं। पलायन ने पर्वतीय क्षत्रों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम कर दिया है और जनता के साथ नेता भी यहां से पलायन कर मैदानी क्षेत्रों में जमीन तलाशने लगे हैं। इसके साथ ही पलायन से दो देशों की सीमाओं पर बसे इस प्रदेश के लिए सुरक्षा का संकट पैदा होने में देर नहीं लगेगी। सीमा पर बसे गांवों और जनता को द्वितीय सुरक्षा पंक्ति माना जाता है, पहली सुरक्षा पंक्ति सेना है। सबसे दुखद यह है कि सीमावर्ती क्षेत्रों से ही सबसे अधिक पलायन हो रहा हैं क्योंकि विकास की किरणें सबसे कम उन्हीं जगहों पर पहुंच रही है। ऐसे में इन क्षेत्रों का खाली होना खतरनाक हो सकता है। सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास के लिए बार्डर एरिया डवलेंपमेंट प्रोग्राम बनाया है, जिसके तहत सीमावर्ती तहसीलों में आधार संरचना को मजबूत करने और विकास के कार्यक्रम चलाने की योजना है लेकिन उसका जमीन पर क्या असर हो रहा है यह देखना भी चाहिए।

पलायन पर सारे राजनीतिक दल चिंतित दिखायी देते हैं लेकिन इसके लिए काम करने की जरूरत किसी को नहीं है। अगर पर्वतीय क्षेत्र में बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पानी की सुविधाएं मिलने लगें तो निश्चित तौर पर पलायन मे कमी आएगी, लेकिन दुर्भाग्य से सरकार का ध्यान इस ओर ही सबसे कम है। अब तो प्रदेश मंे ंराजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हो गया है और राजनीतिक दलों की चिंता कुर्सी पाने और छीनने की है तो पलायन पर कौन बात करना चाहेगा।

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