उत्तराखंड के पहाड़ों से होता पलायन

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भारत भले ही युवाओं का देश हो, लेकिन चम्पावत के गांव बुजुर्गो के भरोसे हैं। कई सालों में युवाओं का मन असुविधाओं से खिन्न था। सरकारी उपेक्षा ने पलायन की राह और साफ कर दी। अब इन गांवों में माटी का मोह न छोड़ पाने वाले बुजुर्ग टूटती उम्मीदों के बीच इनके अस्तित्व को जिंदा रखे हैं।

राज्य बनने के बाद कई सरकारें आई कई गई। कई वायदे हुए, कई घोषणाएं हुई। लेकिन यह सरकारें व जनप्रतिनिधि पलायन रोकने में असफल ही रहे। जिले के 37 गांव ऐसे हैं, जहां 60 साल से कम उम्र के लोग गिनती के ही दिखाई देते हैं। इसकी बानगी है चम्पावत जिला। सरकारी और गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक चम्पावत जिले में 687 राजस्व गांवों में से 36 गांव 70 फीसदी खाली हो चुके हैं। वहीं, 37 गांवों में आबादी 30 से कम बची हुई है। इन गांवों में केवल बुजुर्ग ही हैं। अपनी माटी का मोह न छोड़ पाने वाले बुजुर्ग ही वीरान गांवों में असुविधा के बीच युवाओं के पलायन का दर्द झेल रहे हैं।
चम्पावत ब्लाक में 266 राजस्व गावों में से 17 गांव, पाटी ब्लाक के 164 राजस्व गांवों में नौ गांव, लोहाघाट ब्लाक के 154 राजस्व गांवों में सात और बाराकोट ब्लाक के 130 में से 20 गांव खाली होने की कगार पर हैं। बचे हुए गांवों से लगातार पलायन हो रहा है।

सरकार पलायन रोकने के लिए कई योजनाएं चला रही है। कई योजनाएं सफल भी हो रही हैं। महिलाओं व बेरोजगारों को रोजगार गांव में ही मिले इसकी व्यवस्था की जा रही है।

पलायन का मुख्य कारण बेहतर शिक्षा और रोजगार न मिलना है। राज्य बनने के बाद बुनियादी सुविधाओं का विकास होना था, लेकिन नहीं हुआ। प्रशासनिक इकाइयां व शैक्षणिक संस्थान खुले, लेकिन उनमें सुविधाएं नहीं दी गई। स्कूलों का उच्चीकरण किया गया। लेकिन शिक्षक के अभाव में स्कूल भी खाली हो रहे हैं। सरकार पहाड़ के गांवों के लिए कोई I नीति बनाने में असफल रही है।

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