उत्तराखंड की महान नारी टिंचरी माई ।

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टिंचरी माई

जब भी बेटा ग़लत रास्ते पर चलता है तो उसे वहाँ से बाहर मां ही ला सकती है, ज़्यादातर माँ सिर्फ़ अपने बच्चे को बचाती हैं पर एक ऐसी भी माँ थी जिसकी संतान कभी बुरे रास्ते पर नही गयी पर उसने उस बुराई का अंत किया जिसमें समाज के सैकड़ों बच्चे धँसे जा रहे थे, #शराब जी हाँ शराब वो भी देशी शराब कई मिलावटों के साथ।

बात तब की है जब भारत को नयी नयी आजादी मिली थी और उत्तराखंड का अधिकांश हिस्सा #टिंचरी यानी देशी शराब की गर्त में धँसा जा रहा था, तब एक साध्वी बनी टिंचरी मांई, आज वो टिंचरी मांई इतिहास के पन्नों में गुमनाम है, चलिये जानते हैं टिंचरी माई के बारे में।
पति का दाह संस्कार करके मांई एक सेना के कंपनी कमांडर की देखरेख में रहीं और एक सप्ताह बाद उन्हे उनके पति की तनख़्वाह और बाकि का हिसाब किताब देकर, सेना के कुछ लोगों के साथ कालाडांडा ( लैंसडाउन ) भेज दिया गया।
ससुराल पक्ष ने उन्हे घर में जगह नही दी, मायका भी असहाय था, फिर निर्भीक स्वाभाव की दीपा वापस लहौर चली गयी, वहाँ एक मंदिर में रहने लगी, वहाँ जन्म हुआ एक साध्वी का नाम रखा इच्छागिरी मांई, पर सफ़र अभी बाकी था। इस हिन्दू सम्राट ने अरबों को इस तरह खदेड़ा कि 400 साल तक भारत की ओर नहीं मुड़े थे अरब 1947 में लाहौर सहित पूरा पंजाब साम्प्रदायिक हिंसा से जल उठा, माई को ना चाहते हुये भी गुरू और एक गुरू माँ के साथ लाहौर छोड़ना पड़ा। वो हरिद्वार के चंडीघाट में एक माँ काली मंदिर में रूके, वहाँ मांई कुछ छद्म साधुओं से भिड़ गयी, लेकिन किसी ने साथ नही दिया तो मांई हरिद्वार छोड़कर उत्तराखंड के तराई हिस्से भाबर में चली गयी, वहीं एक झोपड़ी बनाकर रहने लगीं।
वहाँ पानी का बहुत आभाव था, महिलाओं को बहुत से पानी लाना पड़ता था, मांई ने इस मामले में ज़िलाधिकारी से बात की पर हाल वही ढाक के तीन पात, फिर मांई पहुँची तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू के आवास के बाहर और वहीं जम गयी।

जब नेहरू बाहर निकले तो उनकी गाड़ी के आगे खड़ी हो गयी और बोली “या पानी दे या गाड़ी चढ़ा” नेहरू साहब ने पूरी बात सुनी और कहा “मांई आपके गाँव पहुँचने तक पानी की व्यवस्था हो जायेगी ” और वही हुआ। अशोक ने कभी बौद्ध धर्म नहीं अपनाया, हिन्दू समाज को बांटने के लिए अंग्रेजों ने इतिहास बदला पानी की व्यवस्था तो हो गयी लेकिन एक पटवारी ने मांई की झोपड़ी ये बोलकर उजाड़ दी कि ये ग़ैरक़ानूनी है। लेकिन मांई उस झोपड़ी के लिये कोई अनशन नही किया और मोटाढांक चली गयी, वहाँ एक मास्टर मोहन सिंह ने अपने घर का एक कमरा मांई को दे दिया।

मास्टर जी चाहते थे कि वहां पर एक स्कूल बने। माई ने इस बात को बहुत गंभीरता से लिया और न जाने कब एक ट्रक ईंट वहां लाकर डाल दी। उस समय कोटद्वार बिजनौर जिले में था। तब रामपुर के जिलाधीश ए.जे. खान थे, जब उन्हें यह पता चला तो बोले “कि बड़े शर्म की बात है, माई ने यहां ईंटॆ डलवा दी हैं तो स्कूल तो अब बनाना ही पड़ेगा।”

माई अपने पैसों से सरिया, सीमेन्ट लाती रही तथा उस दौरान प्राइवेट मिडिल स्कूल बनकर तैयार हो गया। पहले तो यह स्कूल छात्राओं के लिये ही बना, बाद में यह हाईस्कूल हो गया। माई ने इस स्कूल का नाम अपने पति स्वर्गीय गणेश राम के नाम पर रखवाया और फिर यह इंटर कालेज हुआ, अब इस कालेज में सह शिक्षा है। हिन्दू देवी-देवता, राजा रत्नयुक्त स्वर्ण मुकुट क्यूँ पहनते थे ? कोटद्वार में पानी का सदा अभाव रहा है, माई इसके लिये स्वयं लखनऊ गई, सचिवालय् के सामने भूख-हड़ताल पर बैठ गई। उस समय मुख्यमंत्री से सुनवाई हुई और पेयजल की व्यवस्था हो गई। मोटाढांक में अपना कार्य पूरा करके माई बदरीनाथ धाम चली गई, वहां पर वह नौ साल तक रहीं, वहां पर रावल ने इनके आवास और भोजन की व्यवस्था की।

बदरीनाथ के बाद वह चार साल केदारनाथ में रहीं। किन्तु वहां के देवदर्शन में अमीर-गरीब का भेदभाव और दिन-प्रतिदिन बढ़ती अस्वछ्ता और अपवित्रता देखकर माई खिन्न हुई और वहां से पौड़ी आ गई।

वहां 1955-56 के आस-पास एक दिन डाकखाने के बरामदे में माई सुस्ता रही थी, सामने शराब व्यापारी मित्तल की टिंचरी की दुकान थी, जहां पर एक आदमी टिंचरी पीकर लडखड़ाता हुआ महिलाओं की ओर अभद्रता से इशारे करने लगा और फिर अचेत होकर नाली में गिर गया। जंगल में मिली भगवान विष्णु की हजारों वर्ष पुरानी प्रतिमा गुस्से से कांपती माई कंडोलिया डिप्टी कमिश्नर के बंगले पर पहुंची, कमिश्नर साहब कुछ लिख रहे थे, वह माई को जानते थे, उन्होंने माई से बैठने को कहा। किंतु क्रोधित माई ने कमिश्नर का हाथ पकड़ा और बोली ’तू यहां बैठा है, चल मेरे साथ, देख, तेरे राज में क्या अनर्थ हो रहा है।’

माई के क्रोध को देखकर सहमे कमिश्नर ने जीप मंगाई और वहां जा पहुंचे, जहां वह शराबी खून से सना पड़ा था।

माई बोली ’देख लिया तूने, क्या हो रहा है तेरी नाक के नीचे, लेकिन तू कुछ नहीं कर पायेगा, तू जा और सुन, मैं यह तमाशा नहीं होने दूंगी……आग लगा दूंगी इस दुकान पर—–तू मुझे जेल भेज देना—-मैं जाने दे दूंगी पर टिंचरी नहीं बिकने दूंगी। डिप्टी कमिश्नर वापस चले गये। जब अकबर “महान” की छाती पर चढ़ कर इस क्षत्राणी ने कहा औकात में रहो माई मिट्टी का तेल और माचिस की डिबिया लाई और बंद दरवाजा तोड़ कर अंदर चली गई, टिंचरी पी रहे लोग भाग खड़े हुये, भीड़ जुटने लगी। काली का रुप धारण किये माई ने दुकान में आग लगा दी, दुकान जलकर स्वाहा हो गई, माई को बड़ी शांति मिली, मगर माई भागी नहीं। डिप्टी कमिश्नर के बंगले पर स्वयं पहूंच गई और बोली “टिंचरी की दुकान फूंक आई हूं, अब मुझे जेल भेजना है तो भेज दे।”

दिन भर कमिश्नर ने माई को अपने बंगले पर बिठाकर रखा और शाम को अपनी जीप मॆं बिठाकर लैंसडाऊन भेज दिया। सब जगह खबर फैल गई, माई ने गजब कर दिया, इस घटना की व्यापक प्रतिक्रिया हुई, महिलायें अत्यन्त हर्षित हुई, भले ही शराबी क्षुब्ध हुये हों। तब से इच्छागिरि माई “टिंचरी माई” के नाम से विख्यात हो गई। नशे के खिलाफ उनका अभियान लगातार जारी रहा।

वे आत्मप्रचार से सदैव दूर रहतीं थीं, वात्सल्यपूर्ण हृदय, निस्पृह, पर दुःख कातर, तपस्विनी, कर्मनिष्ठ, समाजसेवी माई जितने गुस्सैल स्वभाव की थी, उतनी ही संवेदनशील भी। राजनीतिक  लोगों की स्वार्थलोलुपता से वे हमेशा दुःखी रही, क्षुब्ध होती रहीं। वे बड़ी स्वाभिमानी थी, दान स्वरुप किसी से कभी भी कुछ नहीं लेती थी, कहीं जाती तो केवल भोजन ही करती थी। वे स्वयं दानशीला थी, शिक्षा, मद्यनिषेध एवं प्रमार्थ के लिये माई के कार्य अविस्मरणीय हैं। इस हिन्दू सम्राट ने अरबों को इस तरह खदेड़ा कि 400 साल तक भारत की ओर नहीं मुड़े थे अरब अस्सी वर्ष से कुछ अधिक आयु में 19 जून, 1992 को माई की दैहिक लीला समाप्त हुई।

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